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  • घर पर लेमनग्रास कैसे उगाएं | How to grow lemongrass at home in hindi

    घर पर लेमनग्रास कैसे उगाएं | How to grow lemongrass at home in hindi

    लेमन ग्रास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी | Important information About Lemon Grass in Hindi

    (How to grow lemongrass at home) लेमन ग्रास (Lemongrass) एक घास का प्रकार है जो पौधों के रूप में पाया जाता है। इसकी बूंदें और पत्तियां एक सुगंधित तेल का स्रोत होती हैं जो भारत, थाईलैंड और वियतनाम जैसे एशियाई देशों में उगाई जाती है।

    लेमन ग्रास में विभिन्न पोषक तत्व जैसे कि विटामिन सी, फोलिक एसिड, मैग्नीशियम, कैल्शियम और कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं। इसके अलावा, इसमें एंटीऑक्सिडेंट गुण भी होते हैं जो शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं।

    लेमन ग्रास के पत्तों से बनाई गई चाय सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होती है। इससे शरीर की ताकत बढ़ती है, अनिंद्रा कम होती है, श्वसन संबंधी समस्याएं कम होती हैं और मस्तिष्क को शांति मिलती है। इसके अलावा, यह पाचन को सुधारती है, मोटापे से निजात दिलाती है और रक्तचाप को नियंत्रित करती है।

    घर पर लेमनग्रास कैसे उगाएं | How to grow lemongrass at home in hindi

    लेमनग्रास का पौधा लगाने का सही समय

    लेमनग्रास को गर्मी की ऋतु में उगाना उचित होता है। यह मार्च-अप्रैल के महीनों में बोटल या बाग में बोने के लिए उपयुक्त समय होता है। इससे पहले प्राकृतिक उपजाऊ मिट्टी में काम नहीं करता है, क्योंकि शुष्कता उसे सुस्त रखती है जिससे वह बीमारी और कीटाणुओं के लिए अधिक संक्रमित होता है।

    लेमनग्रास के पौधे को अच्छी तरह से दिन में समय-समय पर सिंचाई देनी चाहिए ताकि मिट्टी हमेशा थोड़ी गीली रहे। इसके अलावा, इसे नियमित खाद देनी चाहिए ताकि यह अधिक उपजाऊ हो सके।

    ध्यान रखें कि लेमनग्रास धूप की खान को पसंद करता है और उगाने के लिए समय तब तक लगातार गर्म रहता है जब तक कि ठंडा मौसम शुरू नहीं हो जाता है।

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    घर पर लेमनग्रास कैसे उगाएं | How to grow lemongrass at home

    लेमनग्रास को घर पर उगाना (How to grow lemongrass at home) बहुत ही आसान होता है, निम्नलिखित चरणों का पालन करके आप इसे उगा सकते हैं:

    • लेमनग्रास के लिए एक अच्छी और स्थिर मिट्टी का चयन करें। एक बार जब आप इसे उगा लें, तो आप इसे अगले साल भी उगा सकते हैं।
    • मिट्टी को गीला करें और इसे बर्तन में भर दें। फिर इसमें बीज रखें। बीज को मिट्टी में धककर धीरे से बिछा दें और उसे धक्का दें।
    • पौधे को ठंडे पानी से सिंचाएं। लेमनग्रास को सबसे अच्छी तरह से ग्रो करने के लिए आपको उसे नियमित तौर पर सिंचाने की आवश्यकता होगी।
    • पौधे को धूप में रखें। लेमनग्रास को धूप में रखने से उसे अधिक मात्रा में सुरज की किरणों का संचार मिलता है, जो इसे अधिक स्वस्थ बनाता है।
    • लेमनग्रास को खेत में बोने से पहले उसे अच्छी तरह से बचाएं। इसे कीटाणुओं और अन्य बीमारियों से बचाएं और इसे नियमित तौर पर खाद दें।

    लेमनग्रास लगाने के लिए सही गमले और मिट्टी का चयन:

    लेमनग्रास को उगाने के लिए सही गमले और मिट्टी का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है। निम्नलिखित विवरण आपको इस मामले में मदद करेंगे:

    गमले का चयन: लेमनग्रास को उगाने के लिए, आप एक गहरे और चौड़े गमले का चयन कर सकते हैं। गमले की ऊंचाई लेमनग्रास के ऊंचाई से कम से कम दो इंच ज्यादा होनी चाहिए। इससे लेमनग्रास के जड़ अच्छे से जमा हो सकते हैं। गमले में नलकूप भी होना चाहिए ताकि जल निकल सके।

    मिट्टी का चयन: लेमनग्रास के लिए, आप सबसे अच्छी तरह की लोमददार मिट्टी का चयन कर सकते हैं। इसमें खड़ी मिट्टी, खाद और कोम्पोस्ट होना चाहिए। आप एक पाउण्ड खाद और एक पाउण्ड कोम्पोस्ट को बराबरी में मिश्रित कर सकते हैं। इससे लेमनग्रास को अधिक ऊर्जा मिलती है और यह अधिक स्वस्थ बनता है।

    गमले को साफ सुथरा रखें: आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि गमले को साफ सुथरा रखा जाए ताकि वह कीटाणुओं और बीमारियों से मुक्त रहे।

    घर पर लेमनग्रास कैसे उगाएं | How to grow lemongrass at home in hindi

    लेमनग्रास के बीज लगाने की विधि | Lemongrass Seed Planting Method

    लेमनग्रास के बीज लगाने की विधि निम्नलिखित है:

    1. लेमनग्रास के बीज धुले हुए होने चाहिए।
    2. बीजों को कुछ घंटे तक पानी में भिगोएं।
    3. एक बर्तन में मिट्टी लें और उसमें कंटेनर या प्लास्टिक कप रखें।
    4. कप में भीगे हुए बीज रखें और उसे धीमी धीमी आंधी से बचाएं।
    5. बीजों को धकेल दें और ऊपर से थोड़ी सी मिट्टी डालें।
    6. आप इसे दो तरीकों से रख सकते हैं। आप इसे धूप में रख सकते हैं जो अधिकतम धूप प्राप्त करता है या फिर आप इसे किसी ठंडे जगह पर रख सकते हैं।
    7. कुछ हफ्तों में आपके बीजों से लेमनग्रास का पौधा निकलना शुरू हो जाएगा।

    लेमनग्रास के पौधों की देखभाल कैसे करें | How to Care for Lemongrass Plants

    लेमनग्रास के पौधों की देखभाल निम्नलिखित तरीकों से की जा सकती है:

    समय-समय पर पानी दें: लेमनग्रास को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। आपको इसे समय-समय पर पानी देना चाहिए, लेकिन उसे पानी से भरा नहीं रखना चाहिए। पानी भरा हुआ मिट्टी लेमनग्रास को नुकसान पहुंचा सकता है।

    रोग और कीटाणुओं से बचाव: लेमनग्रास को कभी-कभी कीटाणुओं और बीमारियों से ग्रसित होने का खतरा होता है। आपको इसे इन बीमारियों से बचाने के लिए समय-समय पर नियमित रूप से सींग देनी चाहिए।

    तड़के और कीटाणुओं का नियंत्रण: लेमनग्रास पर चढ़ने वाले तड़कों को नियंत्रित करना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके लिए आप नियमित रूप से नीम तेल का उपयोग कर सकते हैं।

    प्रुनिंग: लेमनग्रास को ज्यादा बढ़ने से रोकने के लिए आपको इसे समय-समय पर कटाई करनी चाहिए। इससे यह जल्दी से बढ़ना बंद कर देगा और बहुत अधिक ऊंचा नहीं होगा।

    लेमनग्रास के औषधीय गुण | Medicinal properties of lemongrass

    लेमनग्रास के कुछ औषधीय गुण हैं जो इसे एक लोकप्रिय औषधीय पौधे बनाते हैं। इसके उपयोग के कुछ फायदे निम्नलिखित हैं:

    • अधिक मात्रा में विटामिन सी का स्रोत है: लेमनग्रास में विटामिन सी की अधिक मात्रा होती है, जो शरीर के रोगों से लड़ने में मदद करती है।
    • पाचन को सुधारता है: लेमनग्रास में विशेष प्रकार के तत्व होते हैं, जो पाचन सिस्टम को सुधारते हैं और पेट संबंधी समस्याओं को कम करते हैं।
    • उच्च रक्तचाप को कम करता है: लेमनग्रास में मौजूद एक तत्व होता है, जो उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद करता है।
    • अधिक मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट होते हैं: लेमनग्रास में विशेष प्रकार के एंटीऑक्सिडेंट होते हैं जो फ्री रेडिकल्स को नष्ट करते हैं।
    • उच्च तापमान में रहने की क्षमता: लेमनग्रास उच्च तापमान में रहने की क्षमता रखता है, जो इसे एक लोकप्रिय घरेलू उपचार बनाता है।

    लेमनग्रास के फायदे | Benefits of lemongrass

    लेमनग्रास के कई स्वास्थ्य लाभ होते हैं, जो निम्नलिखित हैं:

    1. संक्रमण से लड़ने में मददगार: लेमनग्रास एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल, एंटीवायरल गुणों से भरपूर होता है जो संक्रमण से लड़ने में मदद करते हैं।
    2. अल्जाइमर का रोकथाम: लेमनग्रास में मौजूद एक तत्व होता है जो अल्जाइमर जैसी बीमारियों का रोकथाम करता है।
    3. पाचन सिस्टम को सुधारता है: लेमनग्रास में विशेष प्रकार के तत्व होते हैं, जो पाचन सिस्टम को सुधारते हैं और पेट संबंधी समस्याओं को कम करते हैं।
    4. रक्तचाप को कम करता है: लेमनग्रास में मौजूद एक तत्व होता है, जो उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद करता है।
    5. फफूंदी संबंधी रोगों को दूर करता है: लेमनग्रास फफूंदी संबंधी रोगों को दूर करने में मदद करता है।
    6. स्किन के लिए फायदेमंद है: लेमनग्रास में विशेष प्रकार के एंटीऑक्सिडेंट होते हैं जो स्किन के लिए फायदेमंद होते हैं।

    निष्कर्ष | Conclusion

    आपने इस लेख से सीखा कि लेमनग्रास के पौधों की देखभाल कैसे करें। और जमीन में बीज कैसे लगाए जाते हैं? लेमन ग्रास के पौधों को घर में कैसे लगाए (How to grow lemongrass at home) आदि बहुत कुछ जाना। उम्मीद है कि, आपको यह सब अच्छे से समझ आया हो, हमारे इस लेख में लेमन ग्रास के पौधों के बारे में सभी जानकारी मिलेगी | हमारी और भी उपयोगी पोस्ट पढ़ने के लिए agricultureinhindi.in पर विजिट करें, यहाँ आपको खेती से रिलेटेड अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त होगी |

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  • मछली पालन (Fish Farming) कैसे करें? जानिए नस्ल, लागत और कमाई

    मछली पालन (Fish Farming) कैसे करें? जानिए नस्ल, लागत और कमाई

    जानिए पूरी प्रक्रिया – मछली पालन (Fish Farming) कैसे शुरू करे?

    Fish Farming, नमस्कार दोस्तों आज इस लेख के माध्यम से आपको बताएंगे की मछली पालन Fish Farming क्या है? मछली पालन व्यवसायिक भाषा में जिसका मतलब मछलियों को अपनी कमाई करने हेतु पालने का होता है । वैसे कुछ आरामपसंद, धनी, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग अपने शौक व अपनी प्रोटीन सम्बन्धी जरूरतों की पूर्ति हेतु भी मछलियों का पालन करते हैं। क्योकि मछली लोगो की प्रोटीन सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने का प्राथमिक स्रोत है।

    यही कारण है, की मछली पालन (Fish Farming) का बिज़नेस India में निरन्तर बढ़ता जा रहा है। तो आज हम इसी विषय पर विस्तार में चर्चा करेंगे आपको हमारे इस लेख में मछली पालन से रिलेटेड अधिक जानकारी प्राप्त हो सकती है।

    सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारत की हिस्सेदारी 1.4% है। अगर कृषि से जुड़े पूरे कारोबार की बात करें तो भारतीय जीडीपी में इनका हिस्सा 4.6% है। आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि भारत में मछली पालन का कारोबार कितना फलता-फूलता है। वर्तमान समय में मत्स्य तालाबों या मछली तालाबों की भारी कमी के कारण समुद्र और नदियाँ ही मछलियों की आवश्यकताओं को पूरा करने का माध्यम हैं। चूंकि मानव ने इन प्राकृतिक संसाधनों से बड़ी मात्रा में मछलियां पकड़ी हैं।

    प्रकृति ने हमारे देश भारत को कई नदियों, झीलों और अन्य जल स्रोतों से सुशोभित किया है। इसलिए मछली पालन व्यवसाय किसी भी उद्यमी के लिए एक उचित निर्णय हो सकता है। इसके अलावा भारत में मछली पालन (Fish Farming) करने के कुछ फायदे भी हैं।

    मछली पालन (Fish Farming) क्या है ?

    मछली पालन हिंदी में एक प्रचलित कृषि व्यवसाय है, जिसमें जल में विभिन्न प्रकार की मछलियों को पाला जाता है। यह एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें मछली को ताजा पानी और खाद की सही मात्रा में प्रदान किया जाता है जो उनके विकास और वजन बढ़ाने में मदद करता है। इस व्यवसाय के अंतर्गत, मछलियों के उत्पादन, विपणन और वित्तीय प्रबंधन से जुड़े कई आवश्यक काम होते हैं।

    मछली पालन (Fish Farming) कई प्रकार से किया जा सकता है, कुछ प्रमुख मछली पालन की विधियां निम्नलिखित हैं:

    तालाब मछली पालन: इसमें मछलियों को छोटे तालाबों में पाला जाता है जो पानी से भरे होते हैं। इस विधि में बड़े पैमाने पर मछलियों की खेती की जाती है जो अधिक मुनाफे की संभावना देती है।

    जलमग्नी मछली पालन: इस तकनीक में मछलियों को जलमग्नी तालों में पाला जाता है जो संयुक्त रूप से खुले और सतह के नीचे से आयताकार टंकों में उत्पन्न होने वाले निस्तारित जल को उपयोग करता है।

    रस्ते के किनारे मछली पालन: यह तकनीक नदी के किनारे या समुद्र तटों के किनारे पर मछलियों की खेती के लिए उपयोग की जाती है। इसमें मछलियों के विकास के लिए समुद्र तटों और नदियों से पानी का उपयोग किया जाता है।

    छत के ऊपर मछली पालन: इस तकनीक में मछलियों को छत के ऊपर बनाए गए टैंकों में पाला जाता है जो सामान्यतया छत के ऊपर बनाए गए पोलीहाउस में होते हैं।

    मछली पालन (Fish Farming) कैसे करें? जानिए नस्ल, लागत और कमाई

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    मछली पालन (Fish Farming) कैसे शुरू करें? 

    मछली फार्म स्थापित करना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन जब व्यावसायिक रूप से मछली पालन करना हो तो कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। तथा इस व्यवसाय को व्यवसायिक रूप से स्थापित करने के लिए उद्यमी को विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। जिनका संक्षिप्त में वर्णन हम नीचे कर रहे हैं:

    1. मछली तालाब की तैयारी:

    मछली पालन (Fish Farming) व्यवसाय के लिए मछली तालाब सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है, जैसा कि आपने एक कविता सुनी होगी “मछली पानी की रानी है, जीवन इसका पानी है”। जी हां, मछली का जीवन तो पानी ही है। इसलिए अगर हमें मछली पालन करना है तो पानी का संरक्षण करना होगा। वहीं पानी को स्टोर करने के लिए फिश पोंड बनाना होगा। मछली तालाब में मछली पालन मौसमी और स्थायी दोनों तरह से किया जा सकता है।

    मछली के तालाब में पानी और मछली के बीज डालने से पहले उसे अच्छे से तैयार कर लेना चाहिए। रिसाव को रोकने के लिए मछली तालाब में पानी छोड़ने के तीन-चार दिन बाद उसमें मछलियों के बीज डालने चाहिए। लेकिन मछली के तालाब में पानी भरने से पहले उसकी अच्छी तरह से सफाई की जानी चाहिए और उर्वरक प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए ताकि मछलियों के लिए इनर फीड उपलब्ध हो सके।

    2. मछली की नस्ल का चुनाव करना:

    मछली पालन (Fish Farming) के लाभदायक व्यवसाय के लिए उद्यमी को मछली की अच्छी नस्ल का चुनाव करना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि खेती का व्यवसाय चाहे बकरी पालन का व्यवसाय हो, डेयरी फार्मिंग व्यवसाय हो या पोल्ट्री फार्मिंग तभी एक लाभदायक व्यवसाय हो सकता है।

    उदाहरण के लिए, कुछ मछलियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें तली में रहने की आदत होती है। और कुछ मछलियां ऐसी होती हैं जिन्हें पानी के बीच में रहने की आदत होती है। इसके अलावा कुछ मछलियां ऐसी भी होती हैं जिन्हें पानी की ऊपरी सतह पर रहने की आदत होती है। भारत की जलवायु के अनुसार मछली की प्रमुख नस्लें निम्नलिखित हैं:

    • कतला मछली (कतला)
    • रोहू
    • मृगल
    • सिल्वर कार्प
    • ग्रास कार्प
    • कॉमन कार्प

    3. मछली के भोजन की व्यवस्था करना:

    इसमें कोई संदेह नहीं है कि अच्छी गुणवत्ता वाला भोजन मछली के तेजी से विकास में मदद करेगा। मछली पालन को व्यवसायिक रूप से करने के लिए आप एकीकृत खेती करके डेयरी उत्पादों, सब्जियों आदि से मछली का खाना बना सकते हैं।

    भारत में मछली पालन (Fish Farming) व्यवसाय से जुड़े अधिकांश किसान अपनी मछली को प्राकृतिक भोजन के आधार पर छोड़ देते हैं। मछलियों के लिए कितना प्राकृतिक भोजन उपलब्ध होगा, यह सब मछली तालाब के निषेचन पर निर्भर करता है।

    4. मछलियों का ध्यान रखें:

    व्यावसायिक मछली पालन (Fish Farming) के लिए मछली की नस्ल और भोजन की व्यवस्था करने मात्र से ही उद्यमी का कर्तव्य समाप्त नहीं हो जाता है। अब समय आ गया है कि आप अपनी मछलियों की अच्छी देखभाल करें। मछलियों को मछली रोगों से बचाने के लिए। जल में उत्पन्न मछलियों के शत्रुओं से मछलियों को बचाने के लिए। छोटी मछलियों को बड़ी मछलियों से बचाने के लिए कदम उठाना। और गंदे पानी की वजह से मछलियों की जान को खतरा न हो इसलिए समय-समय पर पानी के PH स्तर की जांच कराते रहना चाहिए।

    मछली पालन (Fish Farming) कैसे करें? जानिए नस्ल, लागत और कमाई

    मछली पालन (Fish Farming) के लाभ –

    वैसे तो भारत में व्यावसायिक रूप से मछली फार्म स्थापित करने के कई फायदे हैं, लेकिन मुख्य का विवरण इस प्रकार है:

    • जैसा कि हमने ऊपर के वाक्य में बताया है कि भारत में 60% से ज्यादा लोग मछली खाना पसंद करते हैं। जो साफ इशारा करता है कि इस बिजनेस में असीम संभावनाएं हैं।
    • मछली में प्रोटीन की मात्रा अधिक होने के कारण इसकी मांग और मूल्य हमेशा अधिक रहता है।
    • इस व्यवसाय को करने के लिए भारत की जलवायु अनुकूल है। जिससे खतरा कम हो जाता है।
    • अभी हमने कहा कि प्रकृति ने भारत को जल के विभिन्न स्रोतों से नवाजा है। इसलिए मछली पालन से जुड़ा उद्यमी अपने मछली तालाब को किसी भी नजदीकी जल स्रोत से आसानी से भर सकता है।
    • भारत में मछलियों की कई प्रजातियाँ और उप-प्रजातियाँ आसानी से उपलब्ध हो सकती हैं। आप अपने मछली तालाब के लिए तेजी से बढ़ने वाली नस्ल चुन सकते हैं।
    • चूंकि ग्रामीण क्षेत्रों में लेबर आसानी से और सस्ते में मिल जाता है, इसलिए आप इंटीग्रेटेड फार्मिंग भी कर सकते हैं। जिसमें आप मछली पालन के अलावा डेयरी फार्मिंग, बकरी पालन, फार्मिंग आदि भी कर सकते हैं।
    • वह लोग मछली पालन या मछली पालन का व्यवसाय भी कर सकते हैं साथ ही जो भी अन्य काम कर रहे हों। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उनके पास जरूरी जमीन और सेवाएं हों।

    मछली पालन (Fish Farming) की लागत – 

    मछली पालन करने में निवेश की लागत विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है, जैसे कि मछली की नस्ल, बीमारीओं का प्रबंधन, आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता, अधिकृत कर्मचारियों की आवश्यकता और अन्य कारक। निम्नलिखित हैं कुछ सामान्य लागतें जो मछली पालन (Fish Farming) करने में आती हैं:

    • मछली के बच्चों के लिए अंडे या लार्वा खरीदना और पशुओं के लिए खाद खरीदना
    • तालाब के लिए जमीन किराए पर लेना या खरीदना
    • तालाब बनाने और संरचित करने की लागत (मैकेनिकल या विद्युत उपकरण, पंप, वितरण पाइप आदि)
    • विभिन्न तत्वों की टेस्टिंग की लागत, जैसे कि पानी की गुणवत्ता, खाद आदि
    • मछलियों को रखने के लिए टैंक या जाली की लागत
    • अनुमानित आपूर्ति और मार्केटिंग की लागत
    • कर्मचारियों की वेतन और अन्य व्यवस्थाएं, जैसे कि बीमा आदि।

    इस तरह से एक छोटा सा मछली फार्म खोलने में भी उद्यमी को लगभग ₹ 1,700,000 से 1,800,000 लाख तक खर्चा करने की आवश्यकता हो सकती है।

    मछली पालन (Fish Farming) बिजनेस से कितनी कमाई हो सकती है ?

    मछली पालन व्यवसाय से कमाई भिन्न-भिन्न कारकों पर निर्भर करती है जैसे कि मछली की नस्ल, बीमारी नियंत्रण, तकनीकी और प्रबंधन कौशल, वित्तीय प्रबंधन, मार्केटिंग आदि। इसलिए, इससे होने वाली कमाई का अंतिम मूल्यांकन करना मुश्किल होता है।

    फिर भी, अगर सही तरीके से मछली पालन (Fish Farming) व्यवसाय चलाया जाए, तो इससे अच्छी कमाई की जा सकती है। शून्य से शुरू करके एक मध्यम स्तर का मछली पालन व्यवसाय आपको हर महीने लाखों रुपये के आसपास कमा सकता है।

    यदि उद्यमी एक साल में 4000 किलो मछली का उत्पादन करने में भी सफल होता है और इसकी औसतम कीमत यदि हम 120 रूपये प्रति किलो मान के भी चलते हैं। तो इस हिसाब से उद्यमी 120×4000 = ₹480000 की साल में ग्रॉस इनकम कर पाता है।

    आप अपने मछली पालन (Fish Farming) व्यवसाय को बढ़ाते हैं और अधिक नस्लों को शामिल करते हैं तो आप अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। यह भी देखा जा सकता है कि अपनी मछली को बीचने के लिए सही बाजार और ग्राहकों की खोज करें।

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  • टमाटर की खेती कैसे और कब करें | Tamatar Ki Kheti in Hindi

    टमाटर की खेती कैसे और कब करें | Tamatar Ki Kheti in Hindi

    टमाटर की खेती – पूरी जानकारी हिंदी में

    Tamatar Ki Kheti in Hindi: नमस्कार दोस्तों आज इस लेख के माध्यम से जानेंगे की टमाटर की खेती (Tamatar Ki Kheti) कैसे करते है, और कब की जाती है| जैसा की आप सभी जानते है टमाटर पूरी दुनिया में सबसे अधिक खायी जाने वाली सब्जी है, जिसे कोई भी सब्जी जैसे आलू, प्याज आदि के बाद इस्तेमाल में लाया जाता है| (Tamatar Ki Kheti) टमाटर का इस्तेमाल हर सब्जी में किया जाता है इसके अलावा उसे सलाद में भी इस्तेमाल किया जाता है, इसे आप पकाकर भी खा सकते है और बिना पकाये भी खा सकते है|

    टमाटर की फसल (Tamatar Ki Kheti) साल में कभी भी की जा सकती है, इसकी खेती हर मौसम में की जाती है. टमाटर का सेवन मानव शरीर के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है, क्योंकि टमाटर से शरीर के अंदर कई तरह के पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन सी मौजूद होते हैं| साथ ही इसका चेहरे पर भी प्रयोग कर सकते है, चेहरे पर प्रयोग करने से चेहरे पर ग्लो आती है, और चेहरे की छाया दूर होती है|

    टमाटर का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है, सब्जियों और सलाद के अलावा टमाटर का उपयोग सॉस (चटनी) बनाने के लिए भी किया जाता है। बिजनेस करके आप अच्छा खासा पैसा कमा सकते हैं।

    वैसे तो टमाटर की खेती (Tamatar Ki Kheti) साल भर की जा सकती है लेकिन ठंड के मौसम में इस पर विशेष ध्यान देना होता है क्योंकि सर्दियों के मौसम में पाला गिरने से इसकी फसल खराब हो जाती है।

    इसके अलावा भी कई बातों का विशेष ध्यान रखना होता है जैसे- टमाटर की खेती (Tamatar Ki Kheti) के लिए मानक तापमान, टमाटर की खेती (Tamatar Ki Kheti) के लिए उपयुक्त मिट्टी (दोमट मिट्टी) की आवश्यकता होती है। अगर आप भी टमाटर की खेती करना चाहते हैं तो यहां टमाटर की खेती कैसे करें? इसकी जानकारी दी जा रही है।

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    टमाटर की खेती के लिए जरूरी मिट्टी | Tamatar Ki Kheti

    टमाटर की खेती (Tamatar Ki Kheti) के लिए जल निकास वाली उपयुक्त मिट्टी (दोमट मिट्टी) का होना आवश्यक है। दोमट मिट्टी के अतिरिक्त इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। लेकिन मिट्टी में पोषक तत्वों की उचित मात्रा होनी चाहिए और पी.एच. मान भी 6-7 के बीच होना चाहिए।

    ऐसी भूमि पर खेती करना उचित नहीं है जहाँ जल भराव अधिक हो, क्योंकि ऐसे स्थानों पर पानी भर जाने से फसल में अनेक प्रकार के रोग लग जाते हैं। टमाटर के पौधे जमीन से सटे होते हैं और अगर जमीन में पानी भरा हो तो इसके फल भी खराब हो जाते हैं। इसलिए सही जमीन का होना भी जरूरी है।

    टमाटर की खेती कैसे और कब करें | Tamatar Ki Kheti in Hindi

    टमाटर की खेती के लिए जरूरी जलवायु और तापमान | Tamatar Ki Kheti

    टमाटर की खेती (Tamatar Ki Kheti) के लिए किसी विशेष भूमि और किसी विशेष जलवायु की आवश्यकता नहीं होती है, इसकी खेती किसी भी स्थान पर की जा सकती है. लेकिन सर्दियों के मौसम में पड़ने वाली ओस इसकी खेती के लिए हानिकारक होती है। एक आदर्श मौसम इसके लिए सबसे उपयुक्त होता है।

    टमाटर की खेती (Tamatar Ki Kheti) में तापमान का बहुत महत्व होता है, क्योंकि टमाटर के बीजों के अंकुरण के लिए आमतौर पर 20 – 25 डिग्री तापमान पौधे के विकास के लिए अच्छा माना जाता है। जब टमाटर का पौधा विकसित होता है तो इसके पौधे में फूल खिलते हैं, इन फूलों को परागकण और निषेचन के लिए अधिकतम तापमान 30 डिग्री और न्यूनतम 18 डिग्री की आवश्यकता होती है।

    तापमान 38 डिग्री से अधिक होने पर फल और फूल दोनों के गिरने की संभावना रहती है, टमाटर को लाल रंग पाने के लिए लगभग 21-24 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है।

    टमाटर की विकसित किस्में | Varieties of Tomatoes

    आज कल किसानों में टमाटर की कई बदहाली देखने को मिल जाती है | (Tamatar Ki Kheti) टमाटर की ये हालत अलग – अलग वातावरण और वज्रपात के होश से तैयार हो गई है | बाजार में कुछ ऐसी भी छँटाई (हाइब्रिड) त्रुटियाँ मौजूद हैं, वास्तव में कृषक उपयोग कर अधिक व्‍यापक करते हैं टमाटर (Tamatar Ki Kheti) की ऐसी ही कुछ समझ (किस्में) है, जिनके बारे में नीचे बताया गया है:-

    गोल्डन न्यू वैरायटी टमाटर: यह टमाटर की ऐसी विकसित किस्म है जिसमें लगाने के 60 से 65 दिनों में फल तुड़ जाते हैं। टमाटर का यह क़िस्म लाल रंग के आकार में बड़ा होता है | इस क़िस्म के टमाटर का व्यास 600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से भी अधिक हो सकता है | यह सूक्ष्म घाव रोग (Scorching Disease) की क्षमता रखता है | यह सर्दी और बारिश जैसे मौसम में भी आसानी से उपजाए जा सकता है

    गोल्डन जि़मा किस्म वाले संयंत्र: इस क़िस्म के सिद्धांतों का एक ही सीज़न में प्रत्यारोपण किया जाता है इसमें टमाटर गहरे लाल रंग के और आकार में दिखाई देता है यह 700 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का एक-एक करके लगभग एक घन है टमाटर की इस क़िस्म में मुरझा रोग नहीं लगता|

    पूसा शीतल बिस्कुट वाले संयंत्र: 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के पैकेज वाले यह टमाटर की किस्म अत्यधिक ठण्ड वाले राज्यों के लिए तैयार की जाती है, इसकी खेती पर्वतीय क्षेत्रों में की जाती है| इस किस्म के फल लाल रंग के और आकार में चपटे होते हैं।

    पंजाब छुहारा क़िस्म के टमाटर: टमाटर की यह क़िस्म चाहत के लिए कृषि विश्वविद्यालय में तैयार की गई है | सावन की यह किस्म तैयार होने में 90 दिन का समय लेती है | टमाटर के आकार में यह बहुत छोटा होता है | इसे देखने में लाल व पीले रंग के होते हैं गर्मी का मौसम जिसे देखने के लिए इसे अच्छा माना जाता है

    टमाटर की काशी अमन किस्म: टमाटर की यह किस्म पर्ण रोग के लिए उपयुक्त नहीं है| इसकी फसल को तैयार होने में 80 से 90 दिन का समय लगता है और इसकी भविष्यवाणी 500 से 600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

    स्वर्ण समृद्धि क़िस्म: किसी वर्ष वर्षा के मौसम से पहले बढ़ने वाला यह एक छटाई वाला क़िस्म है, इसे खेत में लगाने के बाद यह 55 से 60 दिन में तैयार हो जाता है | यह कम समय में अधिक अनुमान वाला क़िस्म है जो कि तक़रीबन 1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादकता पैदा करता है। इसमें फल ठोस व लाल रंग का होता है |

    स्वर्ण सम्पदा क़िस्म के संयोजी: यह भी एक तरह की छँटाई क़िस्म के संयोजी होती है जो कि वर्षा के मौसम से पहले उठती है, यह फल लाल, बड़े और असरदार होता है। इस क़िस्म के परमाणु अंग और जख्मी नमक रोग से मुक्त रहते हैं | यह 1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का व्यास वाला एक एक करके है |

    काशी अभिमान क़िस्म के टमाटर: यह टमाटर की एक छँटाई क़िस्म है, इसकी सफलता को तैयार होने में 70 से 80 दिन का समय लगता है | इसमें प्रति हेक्टेयर 800 क्विंटल की कमाई होती है, साथ ही इस क़िस्म की सफलता में विषाणु जनित रोग (वायरल रोग) नहीं होता है |

    दिव्या क़िस्म के टमाटर: टमाटर की यह क़िस्म एक ऐसा क़िस्म है जो कि अधिक दिनों तक खसरा नहीं होती है | इसकी रूपरेखा को लगाने के बाद 70 दिनों में तैयार हो जाती है यह प्रति हेक्टेयर 400 से 500 क्विंटल का एक चक्कर वाला क़िस्म है, जो कि झुलसा और आँख के सडन जैसे रोग से मुक्त रहता है|

    इसके अलावा और भी कई प्रकार के बोध हैं, जो अलग-अलग मौसम के अनुसार अलग-अलग जगहों पर उगाए जाते हैं। जैसे:- पूसा-120, अर्का सौरभ, अर्का विकास, सोनाली, पूसा हाइब्रिड-1,2,4 विनाश-2, रश्मी, शक्तिमान, रेडगोल्ड, मिरेकल और यू.एस. 440 जैसे कई अवलोकन हैं।

    टमाटर के पौधों को तैयार कैसे करे | How to Prepare Tomato Plants

    (Tamatar Ki Kheti) टमाटर के बीज सीधे खेत में उगाने की बजाय पहले नर्सरी में तैयार किए जाते हैं। यदि पौधे सामान्य किस्म के हैं तो उनके लिए प्रति हेक्टेयर 400 से 500 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है और यदि संकर प्रकार के हैं तो 250 से 300 ग्राम बीज ही पर्याप्त होते हैं।

    टमाटर की खेती कैसे और कब करें | Tamatar Ki Kheti in Hindi

    बढ़ते बीजों के लिए उचित आकार की क्यारियां तैयार करें. इसके बाद उन क्यारियों में गोबर की खाद अच्छी तरह मिला दें। कार्बोफ्यूरान की उचित मात्रा से मिट्टी का उपचार भी करें। ऐसा करने से पौधों को रोगग्रस्त होने से बचाया जा सकता है।

    बीजों को उपचारित मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें, इसके बाद तैयार क्यारियों में सही समय पर सिंचाई कर दें। (Tamatar Ki Kheti) इसके बाद लगभग 25 से 30 दिनों में टमाटर के पौधे रोपने योग्य हो जाते हैं और उन्हें खेत में लगा दिया जाता है।

    क्यारियों में पौधे लगाने से पहले क्यारियों में अच्छी तरह से पानी और गीलापन किया जाता है, ताकि पौधों के खराब होने की संभावना को कम किया जा सके। खेत में लगाने से पहले पौधों को कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा के घोल से 20 से 25 मिनट तक उपचारित करना चाहिए।

    टमाटर के बीज का चयन

    पेस्ट टमाटर, चेरी टमाटर, सैन मार्ज़ानो, पीला नाशपाती, अमीश पेस्ट, ब्लैक क्रीम, चेरोकी ग्रीन और नेपाल टमाटर कुछ लोकप्रिय किस्में हैं। हालांकि, इन सभी किस्मों को निर्धारित और अनिश्चित प्रकार के टमाटर में बांटा जा सकता है।

    निर्धारक प्रकार के टमाटर के पौधे तब तक अंकुर उत्पन्न करते हैं जब तक बेल पर फूल नहीं खिलते, लेकिन अनिश्चित प्रकार के टमाटर फूलों के साथ अंकुर पैदा करते हैं और तब तक बढ़ते रहते हैं जब तक मौसम की स्थिति अनुकूल नहीं हो जाती।

    पेस्ट या बेर टमाटर मुख्य रूप से इसकी उच्च मांस सामग्री और कम बीज वाले डिब्बों के लिए पसंद किया जाता है। हालाँकि, चेरी टमाटर सलाद, पिज्जा और पास्ता के लिए एकदम सही हैं क्योंकि वे स्वादिष्ट होते हैं। इसलिए यदि आप रसदार टमाटर की तलाश कर रहे हैं, चेरी टमाटर उगाने के लिए सबसे अच्छे हैं।

    टमाटर के फल कब तोड़ने चाहिए | When should tomato fruits be plucked?

    टमाटर की फसल (Tamatar Ki Kheti) बोने के 90 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। फलों को तोड़ते समय अधिक लाल फलों को अलग और सख्त फलों को अलग रखा जाता है, ताकि लाल फलों को नजदीकी बाजार में बेचने के लिए भेजा जा सके और सख्त फलों को दूर के बाजार में बेचा जा सके।

    यदि आपको टमाटर की खेती Tamatar ki Kheti करनी है तो आपको उससे से संबन्धित सभी जानकरी मिलेगी और साथ ही आपको हमारी वेबसाइट पर और भी खेतियों के बारे में बताया है| पिछले लेख में हमने बताया है की आर्गेनिक खेती कैसे करते है?

    Read More About: टमाटर की खेती कैसे करें और उपयुक्त मिट्टी कौन सी है?

  • Organic Farming in Hindi | ऑर्गेनिक खेती क्या है कब और कैसे करें

    Organic Farming in Hindi | ऑर्गेनिक खेती क्या है कब और कैसे करें

    आर्गेनिक खेती की जानकारी हिंदी में –

    Organic Farming in Hindi: नमस्कार दोस्तों, जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत एक विशाल देश है और इसकी लगभग 60 से 70 प्रतिशत आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। हालाँकि, कुछ दशक पहले की कृषि पद्धतियों और वर्तमान कृषि पद्धतियों के बीच एक बड़ा अंतर है।

    स्वतंत्रता से पूर्व भारत में ज्ञात कृषि में रासायनिक पदार्थों का प्रयोग नहीं होता था, परन्तु जनसंख्या विस्फोट के कारण खाद्यान्न की माँग बढ़ने लगी और धीरे-धीरे लोग कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों का प्रयोग करने लगे। दिया |

    जिसकी वजह से आज लोग तरह-तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं, जबकि 1960 से पहले देश में पारंपरिक और जैविक यानी जैविक खेती होती थी। जैविक खेती क्या है, जैविक या जैविक खेती कैसे करें? आज हम यहां इसके बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

    ऑर्गेनिक खेती क्या है? (Organic Farming in Hindi)

    सबसे पहले हम जानेंगे कि आर्गेनिक खेती (Organic Farming) क्या है? आर्गेनिक खेती फसल उत्पादन की एक प्राचीन पद्धति है, जिसे हम जैविक खेती भी कहते हैं। आर्गेनिक कृषि में फसलों के उत्पादन में खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फसल अवशेष तथा प्रकृति में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थों के माध्यम से पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रकार की खेती में प्रकृति में पाए जाने वाले तत्वों का उपयोग कीटनाशकों के रूप में किया जाता है। आर्गेनिक खेती पर्यावरण की शुद्धता बनाए रखने के साथ-साथ भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है।

    आर्गेनिक खेती एक ऐसी कृषि प्रणाली को संदर्भित करती है जिसमें फसलों के उत्पादन में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बजाय जैविक या प्राकृतिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। आज के समय में आर्गेनिक खेती से प्राप्त उत्पाद की मांग बहुत अधिक बढ़ गयी है।

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    दूसरे शब्दों में आर्गेनिक खेती (Organic Farming) एक ऐसी तकनीक है जिसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों के लिए कोई स्थान नहीं होता है। इस विधि में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फसल अवशेष तथा प्रकृति में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के खनिजों के माध्यम से फसलों को पोषक तत्व प्रदान किये जाते हैं।

    आर्गेनिक खेती मिट्टी की उर्वरता को प्राकृतिक बनाने के साथ-साथ पर्यावरण की शुद्धता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वर्तमान समय में आर्गेनिक खेती से प्राप्त फसलों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है।

    Organic Farming in Hindi | ऑर्गेनिक खेती क्या है कब और कैसे करें

    ऑर्गेनिक खेती कैसे करे? | How To Do Organic Farming

    आर्गेनिक खेती को हम स्वदेशी खेती भी कहते हैं, मुख्य रूप से जैविक खेती प्रकृति और पर्यावरण को संतुलित रखते हुए की जाती है।

    इसके तहत फसलों के उत्पादन में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता है।

    इसके स्थान पर गाय के गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जैव उर्वरक, फसल अवशेष, फसल अवशेष तथा प्रकृति में उपलब्ध खनिजों का उपयोग किया जाता है।

    फसलों को विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाने के लिए प्रकृति में उपलब्ध मित्र कीटों, जीवाणुओं एवं जैविक कीटनाशकों को हानिकारक कीड़ों एवं रोगों से बचाया जाता है।

    आज के समय में किसान किसी भी प्रकार की फसल के उत्पादन में तरह-तरह के रासायनिक पदार्थों का प्रयोग करते हैं।

    जिससे उत्पादन की मात्रा तो बढ़ जाती है, लेकिन इससे भूमि की उपजाऊ शक्ति लगातार कम होती जा रही है, साथ ही लोग आए दिन नई-नई बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं।

    इसके साथ ही पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है, हालांकि जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा लगातार प्रयास जारी है।

    ऑर्गेनिक खेती करने की प्रक्रिया | Organic Farming Process

    आर्गेनिक खेती (Organic Farming) करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं के अनुसार काम करना जरूरी है, जो इस प्रकार हैं-

    मिट्टी की जांच (Soil Check): अगर आप आर्गेनिक खेती करना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको अपने खेत की मिट्टी की जांच करवानी चाहिए, जिसे आप किसी भी निजी लैब या सरकारी कृषि विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में करवा सकते हैं।

    इससे किसान को खेत की मिट्टी से संबंधित जानकारी मिल जाती है कि मिट्टी में किस तत्व की कमी है। जिससे किसान उपयुक्त उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग कर अपने खेतों को अधिक उपजाऊ बना सकते हैं।

    आर्गेनिक खाद बनाना (Making Organic Compost): आर्गेनिक या जैविक खेती करने के लिए आपके पास पर्याप्त मात्रा में आर्गेनिक खाद होनी चाहिए। इसके लिए आपको जैविक खाद बनाने की जानकारी होना बहुत जरूरी है।

    जैविक खाद यानी ऐसी खाद, जो पशुओं के मल यानी गाय के गोबर और फसलों के अवशेष से बनती है। वेस्ट डिस्पोजर की मदद से आप 3 से 6 महीने में जैविक खाद तैयार कर सकते हैं।

    फसल विविधता (Crop diversity): आर्गेनिक खेती में फसल विविधता को प्रोत्साहित किया जाता है, जिसके अनुसार एक ही स्थान पर कई फसलें पैदा की जाती हैं।

    ऑर्गेनिक खाद कैसे बनाए | How To Make Organic Compost

    जैविक खाद (Organic Farming) को विभिन्न प्रकार से तैयार किया जाता है, जैसे गोबर की खाद, हरी खाद, गोबर की खाद आदि। इस प्रकार की खाद को प्राकृतिक खाद भी कहा जाता है, इसे बनाने की प्रक्रिया इस प्रकार है:-

    1. खाद बनाने की प्रक्रिया (Process To Make Manure)

    गोबर की खाद बनाने के लिए आपको करीब 1 मीटर चौड़ा, 1 मीटर गहरा और 5 से 10 मीटर लंबा गड्ढा खोदना होगा। सबसे पहले गड्ढे में एक प्लास्टिक की चादर बिछाकर मिट्टी और गाय के गोबर में उचित मात्रा में पशु का गोबर, पशु मूत्र और पानी मिलाकर ढक दें। – करीब 20 दिन बाद गड्ढे में पड़े मिश्रण को अच्छे से मिला लें.

    इसी तरह करीब 2 महीने बाद इस मिश्रण को एक बार फिर से मिक्स करके ढककर बंद कर दें। तीसरे महीने में आपको गाय के गोबर की खाद बनाकर तैयार कर दिया जाएगा, जिसे आप अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर सकते हैं।

    2. वर्मीकम्पोस्ट केंचुआ खाद (Vermicompost Earthworm Manure)

    केंचुए को किसान का मित्र भी कहा जाता है, क्योंकि यह भूमि को उपजाऊ बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केंचुए की खाद बनाने के लिए आपको 2 से 5 किलो केंचुए, गाय का गोबर, नीम के पत्ते और एक प्लास्टिक शीट आवश्यकता के अनुसार चाहिए। एसेनिया फोएटिडा, पाइरोनॉक्सी एक्क्वाटा, एडिल्स जैसे केंचुए 45 से 60 दिन में खाद बना लेते हैं।

    केंचुआ खाद बनाने के लिए छायादार और नम वातावरण की आवश्यकता होती है, इसलिए इसे घने छायादार वृक्षों या छप्पर के नीचे बनाना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि जिस स्थान पर आप यह खाद बनाने जा रहे हैं, वहां जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

    केंचुए की खाद बनाने के लिए एक लंबा गड्ढा खोदकर उसमें प्लास्टिक की चादर बिछा दें और आवश्यकतानुसार गाय का गोबर, खेत की मिट्टी, नीम के पत्ते और केंचुए मिलाकर पानी का छिड़काव करें। आपको बता दें कि 1 किलो केंचुआ 1 घंटे में 1 किलो वर्मीकम्पोस्ट बनाता है और इस वर्मीकम्पोस्ट में एंटीबायोटिक्स होते हैं, जो फसलों को कई तरह की बीमारियों से बचाते हैं।

    Organic Farming in Hindi | ऑर्गेनिक खेती क्या है कब और कैसे करें

    3. हरी खाद (Green Compost)

    जैविक खेती के लिए जिस खेत में आप फसल पैदा करना चाहते हैं, उसमें लोबिया, मूंग, उड़द, ढेचा आदि की बुवाई करें, जो बारिश के कारण समय से उग आते हैं। और करीब 40 से 60 दिन के बाद उस खेत की जुताई कर लें।

    ऐसा करने से खेत को हरी खाद मिल जाती है। हरी खाद में नाइट्रोजन, सल्फर, सल्फर, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम, कॉपर, आयरन और जिंक प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जिससे खेत की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है।

    आर्गेनिक खेती के उद्देश्य | Purpose Of Organic Farming

    • जैविक खेती (Organic Farming) से मिट्टी की उर्वरा शक्ति को उसके प्राकृतिक रूप में बनाए रखा जा सकता है।
    • खाद्य पदार्थों में रासायनिक पदार्थों के प्रयोग को रोका जा सकता है और जैविक खेती से किसान हितैषी कीटों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
    • फसलों में रोग एवं कीट नष्ट करने के लिए रासायनिक शमनकारकों के छिड़काव को रोका जा सकता है ताकि यह स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने में सहायक सिद्ध न हो।
    • जैविक खेती (Organic Farming) से फसलों के साथ-साथ पशुओं की भी अच्छी तरह से देखभाल की जा सकेगी, जैसे उनके भोजन, रख-रखाव, आवास आदि का ध्यान रखा जा सकता है।
    • जैविक खेती का मुख्य उद्देश्य यह है कि इससे पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सके।
    • इसका मुख्य उद्देश्य जंगली जानवरों की रक्षा करना और प्राकृतिक जीवन को संरक्षित करना है।

    आर्गेनिक खेती से लाभ | Organic Farming Benefits

    • जैविक खेती (Organic Farming) से भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है, जिससे अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।
    • जैविक खेती की लागत रासायनिक खेती से कम होती है। जिससे लाभ अधिक होता है।
    • रासायनिक खेती की तुलना में जैविक खेती में पानी की कम आवश्यकता होती है।
      जैविक खेती (Organic Farming) पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मददगार साबित होती है।
    • जैविक रूप से उगाई गई फसलों के सेवन से मनुष्य को किसी न किसी तरह से संक्रमित होने का खतरा रहता है।
    • जैविक खेती की उपज परंपरागत खेती से कम होने के बावजूद बाजार में जैविक खेती से प्राप्त फसलों की मांग अधिक है।
    • इस विधि से खेती करने से कृषि सहायक कीटों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ इनकी संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जाती है।
    • इस विधि के प्रयोग से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है और जल का वाष्पीकरण भी कम होता है।
    भारत में आर्गेनिक खेती करने वाले राज्य | Organic Farming States In India

    भारत में सिक्किम देश का पहला राज्य है, जिसे 100% जैविक खेती करने के लिए ग्लोबल फ्यूचर पॉलिसी अवार्ड दिया गया है। आपको बता दें कि सिक्किम का कुल क्षेत्रफल 7 लाख 29 हजार 900 हेक्टेयर है, जिसमें से केवल 10.20 प्रतिशत क्षेत्र ही खेती योग्य है। जबकि शेष क्षेत्र वन, मौसम रहित भूमि, शीत मरुस्थल एवं अल्पाइन क्षेत्र आदि के अंतर्गत आता है।

    सिक्किम न केवल भारत में बल्कि दुनिया का पहला जैविक राज्य है, जहां किसी भी रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता है। सिक्किम में 66 हजार से अधिक किसान जैविक खेती से लाभान्वित हुए हैं और उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।

    दरअसल, साल 2016 में सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग ने किसी भी तरह के रासायनिक खाद और कीटनाशक के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी|

    साथ ही फसलों के उत्पादन में रासायनिक खाद का प्रयोग करने पर एक लाख (1,00,000) रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस प्रकार सिक्किम भारत का पहला जैविक राज्य बना। वर्तमान में यहां के लोग जैविक खाद से फसल और सब्जियां पैदा करते हैं।

    ऑर्गेनिक खेती में लागत और आय | Cost and Income in Organic Farming

    प्रारम्भ में इस विधि से (Organic Farming) खेती करने में लागत अधिक तथा आय कम हो सकती है, परन्तु 2-3 वर्ष बाद जैविक खेती (Organic Farming) की लागत कम तथा लाभ अधिक होता है। धीरे-धीरे जैविक खेती में लागत शून्य हो जाती है। इसी कारण इसे जीरो बजट खेती भी कहा जाता है।

    ऑर्गेनिक उत्पाद कहाँ बेचे? | Organic Farming Products

    जैविक खेती से प्राप्त उत्पादों को बेचने की समस्या को हल करने के लिए सरकार ने जैविक पोर्टल लॉन्च किया है। इसके अलावा, जैविक बाजार को प्रोत्साहित करने के लिए कृषि एवं सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा एक विकेन्द्रीकृत जैविक कृषि प्रमाणीकरण प्रणाली “भारत की भागीदारी गारंटी प्रणाली” (पीजीएस-इंडिया) लागू की गई है।

    पीजीएस-इंडिया परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) जैविक उत्पादों की स्वदेशी मांग में मदद करती है। इस कारण जैविक उत्पाद का मूल्य रासायनिक उत्पाद से अधिक होता है।

    अगर आप जैविक खेती (Organic Farming in Hindi) से सम्बंधित अन्य जानकारी चाहते है तो आप इस साइट पर देख सकते है साथ ही आप हमारी साइट से खेती से सम्बंधित सभी जानकारी प्राप्त कर सकते है|

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  • Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)

    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)

    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)

    भैंसों की नस्लें

    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle-भैंस प्रजाति की उत्पत्ति भारत में हुई। वर्तमान समय में पालतू भैंसे भारत के उत्तर-पूर्वी भागों में विशेषकर असम और आसपास के क्षेत्रों में आज भी जंगली अवस्था में पाए जाने वाले बोस अरनी( Bos arni ) के वंशज हैं। भैंसों को आम तौर पर नदी और दलदल के प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है, हालांकि दोनों को बुबलस बुब्लिस कहा जाता है। भारत में अधिकांश जानवर नदी के प्रकार के हैं,  यथार्थ उनका नाम नदियों के नाम पैर रखा गया है, हालांकि दलदल के प्रकार भी देश के कुछ हिस्सों में विशेष रूप से भारत के पूर्वी हिस्सों में पाए जाते हैं।

    भारत को कुछ बेहतरीन भैंस नस्लों का गृह क्षेत्र(home field) माना जाता है। दूध के लिए भैंसों की पसंद के कारण, किसी विशेष प्रकार के दूध की जरूरत अधिक है को पूरा करने के लिए प्रजनन क्षेत्र से कई भैंसों को घनी आबादी वाले शहर और औद्योगिक केंद्र में ले जाया जाता है।

    भारतीय भैंसें आज दूध की पूर्ति के लिए महत्वपूर्ण स्रोत में हैं और गायों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक दूध देती हैं। देश में उत्पादित कुल दुग्ध उत्पादन(milk production) (55%) में आधे से अधिक का योगदान 47.22 मिलियन दुधारू भैंसों का है, जबकि 57.0 मिलियन गायों का कुल दूध उत्पादन में केवल 45% का ही योगदान है। भारतीय भैंस पानी की भैंस हैं। भैंसों की लगभग 10 स्वदेशी मानक नस्लें हैं, जो अपने दुग्ध गुणों( दूध के गुणों) के लिए प्रसिद्ध हैं।

    भेसो की नस्ले कुछ इस प्रकार है-    

    मुर्रा||Murra

    यह भैंसों की सबसे महत्वपूर्ण नस्ल है इसे नस्ल की भैंस रोहतक, हिसार, जींद, पंजाब के नाभा और पटियाला जिले में होती हैं।

    जिनका रंग आमतौर पर काला, पूंछ और चेहरे पर सफेद निशान होते है यह कुछ चितकबरी रंग की होती है।

    कसकर मुड़ा हुआ सींग इस नस्ल की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।

    शरीर का आकार विशाल होता है, गर्दन और सिर इसके शरीर की तुलना में बड़े होते है।

    मादाओं का सिर छोटा होता है।

    कूल्हे(hips) चौड़े हैं और आगे और पीछे के हिस्से नीचे की ओर झुके हुए हैं।

    इस नस्ल की भैंस ,गायें भारत में सबसे कुशल दूध और मक्खन वसा उत्पादकों के लिए फेमौस है।

    मक्खन वसा की मात्रा 7% है औसत दूध निकलने की मात्रा 1500-2500 किलोग्राम से अलग होती है औसत दूध की मात्रा 6.8 किलोग्राम / दिन होती है।

    जबकि कुछ अलग-अलग जानवर 19.1 किग्रा/दिन तक उपज देते हैं।

    इन भैसो  की प्रथम ब्यांत(calving) की आयु 45-50 माह तथा दो ब्यांत की अवधि 450-500 दिन होती है।

     Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)
    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle

    नील रवि||Neel Ravi

    इस प्रकार की भैसो की नस्ल पंजाब के फिरोजपुर जिले की सतलुज घाटी और पाकिस्तान के साहीवाल जिले में पाई जाती है।

    इन भेसो की पहचान (शारीरिक बनावट) -आमतौर पर माथे, चेहरे, थूथन, पैर और पूंछ पर सफेद निशान के साथ रंग काला होता है।

    मादा भेसो का सबसे वांछित चरित्र सफेद निशानों का होना है।

    सिर लम्बा है, शीर्ष पर उभरा हुआ है और आँखों के बीच दबा हुआ है।

    इन भेसो के शरीर का आकार मध्यम होता है अथार्त (ना ज्यादा अधिक छोटा और ना ज्यादा अधिक बड़ा ) है।

    नस्ल की ख़ासियत दीवार आँखें (अथार्त बड़ी- बड़ी  बटुआ आखे) हैं।

    सींग छोटे और कसकर कुंडलित(tightly coiled) होते हैं। गर्दन लंबी, पतली और सुडौल होती है।

    निल रवि इस प्रजाति की एक  भेस  1500-1850 किग्रा प्रति दूध देती है जिसकी समय अवधि 500-550 दिन है।

    इन भैसो  की ब्यांत(calving) की आयु 45-50 माह होती है।

     Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)
    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle

    भदावरी||Bhadaavaree

    इस प्रकार की भेसो को नस्ल उत्तर प्रदेश के आगरा और इटावा जिले और मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में होती है।

    शरीर मध्यम आकार और पच्चर(wedge) के आकार का है। सिर तुलनात्मक रूप से छोटा होता है, पैर छोटे और मोटे होते हैं, और खुर काले होते हैं। हिंद क्वार्टर समान हैं और फोरक्वार्टर से अधिक हैं।

    इस नस्ल की एक विशेषता है की इनका शरीर आमतौर पर हल्का या तांबे के रंग का होता है, आंखों की पलकें आमतौर पर तांबे या हल्के भूरे रंग की होती हैं।

    सुरती भैंसों के समान गर्दन के निचले हिस्से में दो सफेद रेखाएं ‘शेवरॉन’ मौजूद होती हैं।

    इन बसों की शारीरक बनावट कुछ इस प्रकार होती है जैसे- सींग काले होते हैं, थोड़ा बाहर की ओर मुड़े हुए होते है

    औसत दुग्ध उत्पादन 1450 से 1800 किग्रा. होता है।

    बैल उच्च ताप सहने वाले अच्छे भारवाही जानवर होते हैं।

    इन भेसो के दूध में वसा की मात्रा 6 से 12.5 प्रतिशत तक होती है। यह नस्ल मोटे आहार को बटरफैट में परिवर्तित करने में कुशल है और इसे उच्च बटर फैट सामग्री के लिए जाना जाता है।

     Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)
    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle

     

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    जाफराबादी||Jaapharaabaadee

    ये विशाल जानवर हैं जो गिर के जंगलों में अपने शुद्ध रूप में पाए जाते हैं। इस नस्ल का प्रजनन क्षेत्र गुजरात के कच्छ और जामनगर जिले हैं।

    इन जानवरो के शारीरक ढके की पहचान- सिर और गर्दन बहोत बड़ा होता है, और माते पर कुछ छटा सा  निशान होता है, इसके सींगमुड़े हुए होते है।

    इनके सींग भारी होते हैं, गर्दन के प्रत्येक तरफ झुकते हैं और फिर बिंदु पर मुड़ते हैं, लेकिन मुर्राह (झुकने वाले सींग) की तुलना में कम घुमावदार होते हैं।

    इनका रंग आमतौर पर काला होता है।

    यह भेसो औसत दूध 100 से 1200 किग्रा. देती है , इन जानवरों को ज्यादातर मालधारी नामक पारंपरिक प्रजनकों द्वारा रखा जाता है, जो खानाबदोश हैं।

    इस प्रजाति के बेल भरी बैल भारी होते हैं और हल जोतने और गाड़ी चलाने के काम आते हैं।

     Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)
    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle

    सुरती||Suratee

    इस नस्ल का प्रजनन क्षेत्र गुजरात का कैरा और बड़ौदा जिला है।

    कोट का रंग रस्टी ब्राउन से सिल्वर-ग्रे तक भिन्न होता है। त्वचा काली या भूरी होती है।

    शरीर मध्यम आकार का  होता है,  जोकि बैरल पच्चर(wedge)के आकार का है।

    सिर लम्बी आँखों वाला होता है।

    सींग दरांती के आकार के, मध्यम लंबे और चपटे होते हैं।

    रंग काला या भूरा होता है

    नस्ल की ख़ासियत दो सफेद कॉलर, एक जबड़े के चारों ओर और दूसरी ब्रिस्किट(brisket) पर होती है।

    इस प्रजाति की भेसो  900 से 1300 किलोग्राम तक दूध देती है।

    इन भैसो  की ब्यांत(calving) की आयु 40-50 महीने होती है, जिसमें 400-500 दिनों की अंतराल अवधि होती है।

    इस नस्ल की ख़ासियत दूध में बहुत अधिक वसा प्रतिशत (8-12%) है।

     Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)
    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle

    मेहसाणा||Mehasaana

    मेहसाणा गुजरात के मेहसाणा शहर और आसपास के महाराष्ट्र राज्य में पाई जाने वाली भैंस की एक डेयरी नस्ल है।

    इनका शरीर ज्यादातर काला होता है और कुछ जानवर काले-भूरे रंग के होते हैं।

    माना जाता है कि नस्ल सुरती और मुर्राह के बीच संकरण(hybridization) से विकसित हुई है।

    मुर्रा की तुलना में शरीर लंबा है और अंग हल्के हैं।

    सिर लंबा और भारी होता है।

    मुर्रा नस्ल की तुलना में सींग आमतौर पर अंत में कम घुमावदार होते हैं लेकिन लंबे होते हैं और अनियमित आकार के हो सकते हैं।

    यह प्रजाति 1200-1500 किलोग्राम दूध देती  है।

    माना जाता है कि नस्ल में अच्छी निरंतरता है।

    अंतराल अवधि 450-550 दिनों के बीच होती है।

     Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)
    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle

    नागपुरी( एलीचपुरी)||Nagpuri(Elitchpuri)

    इस नस्ल का प्रजनन क्षेत्र महाराष्ट्र के नागपुर, अकोला और अमरावती जिले हैं।

    इनकी शारारिक बनावट कुछ इस प्रकार है- ये काले रंग के जानवर हैं जिनके चेहरे, टांगों और पूंछ पर सफेद धब्बे होते हैं।

    इसे एलिचपुरी या बरारी भी कहा जाता है।

    इनके सींग लंबे, सपाट और घुमावदार होते हैं, जो पीछे की ओर लगभग कंधे तक पीछे की ओर झुकते हैं (तलवार के आकार का सींग)।

    इस प्रकार के सींगों का एक विशिष्ट लाभ यह है कि वे जानवरों को जंगली जानवरों से बचाने में मदद करते हैं और जंगल में आसानी से चलते हैं।

    इनका चेहरा लम्बा और पतला होता है और  गर्दन थोड़ी -सी लंबी होती है।

    यह प्रजाति 700-1200 किलोग्राम दूध देती है।

    पहले ब्यांत (calving) की उम्र 45-50 महीने होती है, जिसमें 450-550 दिनों की अंतराल अवधि होती है।

    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle
    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle

    गोदावरी||Godaavaree

    गोदावरी देशी भैंसों के मुर्रा बैलों के साथ संकरण(hybridization) का परिणाम है इनके गृह पथ गोदावरी और कृष्णा डेल्टा क्षेत्र है।

    इन जानवरो के शारीरिक बनावट कुछ इस प्रकार है-जानवर मध्यम कद के सुगठित शरीर वाले होते हैं। मोटे भूरे बालों के विरल कोट(sparse coat) के साथ रंग मुख्य रूप से काला है।

    गोदावरी भैंस 5-8 लीटर की दैनिक औसत दूध उपज और 1200-1500 लीटर दुग्ध उत्पादन के साथ उच्च वसा के लिए प्रतिष्ठित(Prestigious) हैं।

    जानवर नियमित रूप से प्रजनन करते हैं और मुर्राह की तुलना में उनके ब्याने(calve) का अंतराल कम होता है।

     Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)
    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle

    पंढरपुरी||Pandharpuri

    यह प्रजाति दक्षिण महाराष्ट्र में कोल्हापुर, सोलापुर जिलों की तरफ पाई जाती है।

    शरीर का रंग हल्के काले से लेकर गहरे काले रंग तक होता है।

    यह मध्यम आकार का जानवर है जिसका लंबा संकीर्ण चेहरा, बहुत प्रमुख और सीधी नाक की हड्डी, तुलनात्मक रूप से संकीर्ण ललाट की हड्डी और लंबा कॉम्पैक्ट शरीर होता है।

    इस नस्ल की विशिष्ट विशेषता इसके सींग हैं जो बहुत लंबे, पीछे की ओर मुड़े हुए, ऊपर की ओर और आमतौर पर बाहर की ओर मुड़े हुए होते हैं। सींग बहुत लंबे होते हैं जो कंधे के ब्लेड(shoulder blades) से आगे बढ़ते हैं, कभी-कभी हड्डियों को पिन तक करने लगते है।

     Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle(ज्यादा दूध देने वाली भैंस की नस्ल)
    Jyada Dudh Dene Wali Bhains Ki Nasle

    टोडा||Toda

    भैंसों की टोडा नस्ल का नाम दक्षिण भारत के नीलगिरी की एक प्राचीन जनजाति टोडा के नाम पर रखा गया है।

    बछड़े के कोट का रंग आम तौर पर जन्म के समय हलके पीले रंग का होता है।

    वयस्क में कोट के प्रमुख रंग हलके पीले रंग के और राख-भूरे रंग के होता हैं।

    ये भैंस अन्य नस्लों से काफी अलग हैं और नीलगिरी पहाड़ियों के लिए स्वदेशी हैं।

    जानवरों का शरीर लंबा, गहरी और चौड़ी छाती और छोटे और मजबूत पैर होते हैं।

    सिर अच्छी तरह से अलग सेट सींग के साथ भारी है, अंदर की ओर और आगे की ओर मुड़ा हुआ है।

    पूरे शरीर पर मोटे बालों का कोट पाया जाता है। ये मिलनसार स्वभाव के होते हैं।

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  • Benefits of Bhringraj in Hindi|| भृंगराज के फायदे

    Benefits of Bhringraj in Hindi|| भृंगराज के फायदे

    भृंगराज क्या है? What is Bhringraj

    दोस्तों हम इस आर्टिकल में भृंगराज क्या है(What is Bhringraj) और भृंगराज के फायदे इनके बारे में पढ़ेंगे-(Benefits of Bhringraj in Hindi)

    भृंगराज भारत में एक आम खरपतवार है।  इसे झूठी डेज़ी के रूप में भी जाना जाता है, और इसका वैज्ञानिक नाम एक्लिप्टा अल्बा या एक्लिप्टा प्रोस्ट्रेटा है।  पौधों के एक्लिप्टा जीनस (समूह) में आम तौर पर कई सक्रिय(छोटे- छोटे)  रसायन होते हैं, और भृंगराज को इन रसायनों के माध्यम से काम करने के लिए माना जाता है।

    भृंगराज एक आयुर्वेदिक पौधा है जो अपने स्वास्थ्य लाभों के कारण काफी लोकप्रिय है। बालों को फायदा पहुंचाने के अलावा यह शरीर को कई तरह से मदद करता है। यह त्वचा के लिए अच्छा होता है और सांस संबंधी समस्याओं से निपटने में भी मदद करता है। यही कारण हैं कि सदियों से भारत में भृंगराज को एक प्रभावी घरेलू उपचार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है।

    चिकित्सकीय रूप से, भृंगराज को एक्लिप्टा प्रोस्ट्रेटा या एक्लिप्टा अल्बा के रूप में जाना जाता है। पौधे 4 प्रजातियों में विभिन्न रंगों में फूलों के साथ आता है। सफेद और पीली किस्में वे हैं जिनका आयुर्वेद में बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। भृंगराज में कई बायोएक्टिव यौगिक हैं, जैसे ओरोबोसाइड, उर्सोलिक एसिड और ल्यूटोलिन आदि – जो इसके कई स्वास्थ्य लाभों के लिए जिम्मेदार हैं।

    • भृंगराज का देसी नाम क्या है-  भृंगराज को केसराज के नाम से भी जाना है।

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    भृंगराज के फायदे- Benefits of Bhringraj in Hindi

    Benefits of Bhringraj in Hindi|| भृंगराज के फायदे
    Benefits of Bhringraj in Hindi|| भृंगराज के फायदे

    1. यह मधुमेह के प्रबंधन में मदद कर सकता है(It can help manage diabetes)

    भृंगराज में ऐसे गुण होते हैं जो इंसुलिन के स्राव को उत्तेजित कर सकते हैं। भृंगराज की पत्तियों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा के रूप में किया जाता है। जब अन्य लाभकारी पौधों जैसे लीकोरिस वीड और बरमूडा घास के साथ मिलाया जाता है, तो भृंगराज चीनी के स्तर को प्रभावी ढंग से संतुलित करने में मदद कर सकता है और इस प्रकार मधुमेह वाले लोगों के लिए अच्छा है। यह एक प्रकार की औषधि है।

    2. यह रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार करता है(It improves immunity)

    भृंगराज में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले गुण होते हैं जो पर्यावरण में हानिकारक कीटाणुओं से सुरक्षा प्रदान करते हैं जिससे हम लगातार संपर्क में रहते हैं। यह स्वस्थ के लिए अच्छा है।

    3. यह सांस संबंधी समस्याओं से निपटने में मदद करता है(It helps in dealing with respiratory problems)

    भृंगराज ब्रोंकाइटिस और अस्थमा जैसी बीमारियों के इलाज में मदद करता है। ये विकार वायुमार्ग में सूजन का परिणाम हैं जो फेफड़ों से हवा को अंदर और बाहर ले जाने के लिए जिम्मेदार हैं। यह सूजन घरघराहट, खांसी और सांस की तकलीफ का कारण बनती है। भृंगराज के एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण इन श्वसन समस्याओं को कम करने में मदद करते हैं। भृंगराज का इंजेक्शन या इसका नाक प्रशासन अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी स्थितियों से राहत दिलाने में मदद कर सकता है। इसका प्रयोग आयर्वेदिक दवाइयों के साथ और घरेलू तरीको से उपयोगी करने में मदत करता है।

    4. यह दिल की सेहत के लिए अच्छा है(It is good for heart health)

    भृंगराज रक्तचाप के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है और शरीर में कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है। एक स्वस्थ रक्तचाप और संतुलित कोलेस्ट्रॉल के स्तर के परिणामस्वरूप स्वस्थ हृदय होता है। भृंगराज ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर को कम करने में भी मदद करता है, जो हृदय रोग के लिए एक और जोखिम कारक है। भृंगराज पत्तियों के अर्क और शहद की मदद से दिल की धड़कन जैसी स्थितियों से निपटा जा सकता है।

    5. यह त्वचा के लिए अच्छा होता है(It is good for the skin)

    परंपरागत रूप से, भृंगराज का उपयोग त्वचा रोगों के इलाज के लिए भी किया जाता रहा है। भृंगराज उस कवक से लड़ता है जो त्वचा में संक्रमण का कारण बनता है। त्वचा पर भृंगराज के पत्तों का पेस्ट लगाने से त्वचा के संक्रमण से निपटने में मदद मिलती है। भृंगराज की मदद से एक्जिमा और त्वचा के फोड़ों का भी इलाज किया जा सकता है।

    6. यह लिवर के लिए अच्छा होता है(It is good for the liver)

    शरीर के सबसे बड़े अंगों में से एक लिवर शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है। भृंगराज हानिकारक रसायनों से लीवर को सुरक्षा प्रदान करता है जो इसे नुकसान पहुंचा सकते हैं। डेमिथाइल-वेडेलोलैक्टोन और वेडेलोलैक्टोन भृंगराज में कुछ यौगिक हैं जो एंटी-टॉक्सिक गतिविधियां करते हैं जो लिवर कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने में योगदान करते हैं।

    7. यह पेचिश से निपटने में मदद करता है( It helps combat dysentery)

    पेचिश एक स्वास्थ्य स्थिति है जो दस्त, पेट में ऐंठन, उल्टी और बुखार का कारण बनती है। भृंगराज पेचिश पैदा करने वाले बैक्टीरिया से लड़ने में मदद करता है। पेचिश से निपटने के लिए भृंगराज का काढ़ा मौखिक रूप से दिया जा सकता है। भृंगराज के पत्तों का रस शहद के साथ लेने से भी पेचिश के लक्षणों को कम करने में मदद मिल सकती है।

    8. यह बालों के लिए अच्छा होता है ( It is good for hair)

    हम सभी इस बात से वाकिफ हैं कि भृंगराज बालों के लिए अद्भुत है। इसमें बाल-मजबूत करने वाली जड़ी-बूटियाँ होती हैं जो समय से पहले सफ़ेद होने से रोक सकती हैं और बालों के झड़ने से निपटने में मदद कर सकती हैं। भृंगराज बालों के विकास के चरण में बालों के रोम को बढ़ाने के साथ-साथ बालों के विकास की प्रक्रिया को तेज करता पाया गया है। जब बालों के विकास में सुधार की बात आती है तो भृंगराज बहुत अच्छा काम करता है। भृंगराज में इतनी होती है वह अर्धगंजपन दूर के नए सिरे से बालो को लाने में भी मद्दत कर सकता है। यही सही तरीके और नियमित इस्तेमाल किया जाए तो।

    भृंगराज का तेल घर पर कैसे बनाये (How to make Bhringraj oil at home)

    Benefits of Bhringraj in Hindi|| भृंगराज के फायदे
    Benefits of Bhringraj in Hindi|| भृंगराज के फायदे
    • घर का बना भृंगराज हेयर ऑयल

    1.सबसे पहले एक पैन में नारियल का तेल या सरसों का तेल डालें।

    2.अब उसमें भृंगराज के पत्ते या पाउडर डालें।

    3.फिर उसे जब तक गरम करे तब तक तेल में पत्तो का अरक ना आजाये।

    4.मिश्रण के हरे रंग में बदलने तक पकाएं।

    5.उसके बाद मिश्रण में मेथी दाना डालें।

    6.फिर तेल को आंच से उतार लें और तेल को ठंडा होने दें।

    7.ठंडा होने के बाद तेल को छान कर एक बर्तन में रख लें।

    कुछ जरुरी बातें –

    इस तेल को बालो में लगाए इसे बाल बहुत सवस्थ और अच्छे हो जायेगे । इसे साफ़ बालो में ही लगाना चाइये धूल और पर्दूषण से रहित बालो में यह तेल नहीं लगाना चाइये, अगर आप दूषित बालो में इस यह कोई भी तेल का इस्तेमाल करते हो तो, इसे बालो की जाड़े कमजोर होती है यदि आप किसी भी प्रकार का तेल आपने बालो में लगा रहे हो तो आप के बाल साफ़ ही होने चाहिए जिसे तेल की गुणवत्ता आपके बालो में सही से जा सके और उन्हें पर्याप्त मात्रा में तेल से मिलने वाला पोषण मिल सके।

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  • चावल की खेती के लिए आवश्यक खाद कोनसी है-Chaaval Kee Khetee ke liye Savashyak Khaad Konase Hai

    चावल की खेती के लिए आवश्यक खाद कोनसी है-Chaaval Kee Khetee ke liye Savashyak Khaad Konase Hai

    चावल की खेती के लिए आवश्यक खाद कोनसी है-Chaaval Kee Khetee ke liye Savashyak Khaad Konase Hai

     

    चावल की खेती के लिए पोषक आवश्यकताएँ

    किसी भी उर्वरक को लगाने से पहले, आपको सबसे पहले अर्धवार्षिक या वार्षिक मिट्टी परीक्षण के माध्यम से अपने खेत की मिट्टी की स्थिति का आकलन करना चाहिए। मिट्टी का विश्लेषण करने के बाद, एक लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी से सलाह लें, जो आपको मिट्टी की आवश्यकता के बारे में मार्गदर्शन करेगा।

    विकास के लिए सभी स्थूल और सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, हालाँकि, नाइट्रोजन और पोटेशियम ऐसे पोषक तत्व हैं जिनकी चावल को सबसे अधिक आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन उपज से संबंधित सभी मापदंडों को प्रभावित करता है (उदाहरण के लिए, स्पाइकलेट संख्या प्रति पुष्पगुच्छ, भरी हुई स्पाइकलेट्स का प्रतिशत, अनाज प्रोटीन सामग्री), इसलिए उच्च पैदावार प्राप्त करने के लिए पर्याप्त एन आपूर्ति की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, एन की कमी चावल में सबसे अधिक पाई जाने वाली पोषक तत्व की कमी है।

    फास्फोरस विकास के प्रारंभिक चरण (जुताई के लिए) के दौरान महत्वपूर्ण है। जब चावल के पौधे की जड़ प्रणाली पूरी तरह से विकसित नहीं होती है, तो पौधे में फास्फोरस आधारित उर्वरक डालना चाहिए। यह प्रकाश संश्लेषण दर को बढ़ाता है, जिससे अधिक पैदावार होती है।

    पोटैशियम

    पोटेशियम- उच्च चावल की पैदावार सुनिश्चित करता है। यह चावल को रोग प्रतिरोधी बनाता है, जड़ के आकार, मोटाई को बढ़ाता है और पत्ती के विकास को बढ़ावा देता है।

    चावल के खेत और मिट्टी की तैयारी

    अपने चावल की पैदावार बढ़ाने के लिए, शुरुआत से ही सब कुछ सही ढंग से किया जाना चाहिए। चावल के खेत दो मुख्य विधियों का उपयोग करके तैयार किए जाते हैं:

    गीली तैयारी विधि- सूखी तैयारी विधि

    गीली तैयारी विधि निम्न और उच्च भूमि वाले क्षेत्रों में उपयोग के लिए उपयुक्त है। इसे तैयार करने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है क्योंकि मिट्टी को जलभराव की स्थिति में जोता जाता है। दूसरी ओर, सूखी तैयारी के लिए जलभराव की स्थिति में भूमि की जुताई करने की आवश्यकता नहीं होती है।

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    चावल बोने की दो विधियाँ हैं:-

    प्रत्यारोपण विधि-
    औसतन, आपको प्रति हेक्टेयर (100 – 160 किलोग्राम) बीज की आवश्यकता होगी। कुछ किस्मों के लिए, आपको प्रति हेक्टेयर (220-250 किलोग्राम) बीज की आवश्यकता हो सकती है। सीधी बुवाई शुरू करने से पहले, बीजों को आमतौर पर 1-2 दिनों के लिए उष्मायन किया जाता है। फिर उन्हें एक सीधी रेखा में लगाया जाता है, उनके बीच 6 से 10 इंच (15-25 सेमी) की जगह छोड़ी जाती है। इसके बाद पानी को या तो सीधे बोने के तुरंत बाद या 8-12 दिनों के बाद खेत में भरने दिया जाता है।

    रोपाई-
    यदि आप धान की रोपाई कर रहे हैं, तो अपने बीजों की क्यारी को ऐसे क्षेत्र में तैयार करें जो रोपाई किए जाने वाले क्षेत्र का लगभग 2-10% हो। उदाहरण के लिए, यदि हमारा खेत 10 हेक्टेयर (100.000 वर्ग मीटर) है, तो हमारे बीजों का आकार कम से कम 0.2 हेक्टेयर होना चाहिए। आपको प्रति हेक्टेयर लगभग (700 किलोग्राम) बीज की आवश्यकता होती है, हालांकि यह लगाए जाने वाली किस्म के आधार पर भिन्न हो सकता है।

    चावल को 2 से 4 इंच की दूरी पर पंक्तियों में बोना चाहिए। बुवाई समाप्त करने के बाद, पानी को 2 इंच की गहराई तक बीजों को भरने दें। 15 से 40 दिनों तक धान के पौधों को नर्सरी में रखना चाहिए (प्रश्नगत किस्म के आधार पर)। जब पौधे 8-12 इंच की ऊंचाई तक पहुंच जाएं, तो उन्हें रोपाई के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

    Chaaval Kee Khetee ke liye Savashyak Khaad Konase Hai
    पोटेशियम की कमी

    अगर चावल में पोटैशियम की कमी है तो आप देखेंगे कि पत्ते गहरे हरे रंग के हो गए हैं। इसके अलावा, पुराने पत्ते मुरझाने के लक्षण दिखाएंगे और भूरे रंग के हो जाएंगे। अन्य किस्मों में, पत्तियां लाल और बैंगनी रंग की हो सकती हैं। पोटेशियम की कमी कई कारकों के कारण हो सकती है उनमें से एक रेतीली मिट्टी और कम कार्बनिक पदार्थ वाली भूमि में चावल बोना है।

    फास्फोरस महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बढ़ावा देता है

    • प्रारंभिक फसल विकास
    • मजबूत जड़ प्रणाली
    • समान फसल विकास

    कैल्शियम की कमी

    कैल्शियम की कमी वाले चावल पीले और मुरझाने के लक्षण दिखा सकते हैं। उनके पास विभाजित या लुढ़का हुआ टिप भी हो सकता है, साथ ही मलिनकिरण भी हो सकता है। पुराने पत्ते भी शिथिल होने लग सकते हैं। कमी के लक्षण आमतौर पर पहले युवा पत्तियों पर दिखाई देते हैं, उसके बाद छोटी, गहरे भूरे रंग की जड़ें दिखाई देती हैं। कैल्शियम की कमी जड़ के कार्य को ख़राब कर सकती है और आयरन की कमी को जन्म दे सकती है।

    • कैल्शियम यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि पत्ते स्वस्थ हैं।

    नाइट्रोजन की कमी

    नाइट्रोजन की कमी एक ऐसी स्थिति है जिसमें पौधों में नाइट्रोजन की कमी होती है। नतीजतन, पुरानी पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और फिर सिरे से शुरू होकर हल्के भूरे रंग के नेक्रोसिस के शिकार हो जाती हैं। पर्याप्त नाइट्रोजन के बिना पौधे धीरे-धीरे परिपक्व होते हैं, जिससे उत्पादन की लागत बढ़ जाती है।

    चावल को नाइट्रोजन की बहुत आवश्यकता होती है। मिड टिलरिंग और पुष्पगुच्छ की शुरुआत के चरणों के बीच अधिकांश नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन महत्वपूर्ण है क्योंकि;

    • यह सुनिश्चित करता है कि पत्ते अच्छी स्थिति में हैं
    • प्रकाश संश्लेषण में मदद करता है यह और भी बहुत से कार्य करता है

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  • FAQ about Agriculture, Farming Equipment in Hindi- कृषि, खेती के उपकरण के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    FAQ about Agriculture, Farming Equipment in Hindi- कृषि, खेती के उपकरण के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    कृषि, खेती के उपकरण के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न-(FAQ about Agriculture, Farming Equipment in Hindi )

    Q.1 पहला आधुनिक ट्रैक्टर का आविष्कार किसने किया था?

    उत्तर. 1901 में, डैन एल्बोन द्वारा पहले वाणिज्यिक हल्के पेट्रोल ट्रैक्टर का आविष्कार किया गया था।

    Q.2 कौन सा ट्रैक्टर सबसे अच्छा और सबसे शक्तिशाली है?

    उत्तर. जॉन डीरे 6120 बी 4डब्ल्यूडी, प्रीत 10049 4डब्ल्यूडी और अन्य सहित सर्वश्रेष्ठ और सबसे शक्तिशाली ट्रैक्टरों की एक विशाल सूची है।

    Q.3 ट्रैक्टर में PTO HP का क्या उपयोग होता है?

    उत्तर. पीटीओ हॉर्सपावर विभिन्न उपकरणों को संचालित करने के लिए उपलब्ध शक्ति की मात्रा को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, पीटीओ जुताई के लिए औजार ढोता है और कई फसलें बोता है।

    Q.4 मिनी और यूटिलिटी ट्रैक्टर में क्या अंतर है?

    उत्तर. मिनी ट्रैक्टर आकार में छोटे होते हैं, जिनमें 11.1 एचपी -36 एचपी होते हैं, जो छोटे पैमाने पर खेती और भूमि की कटाई के कार्यों के लिए आदर्श होते हैं। उपयोगिता ट्रैक्टर आकार में बड़े होते हैं, 40 hp से 100+ hp के बीच hp होते हैं, जो उच्च अंत कृषि कार्यों के लिए आदर्श होते हैं।

    Q.5 ट्रैक्टर में HP क्या होता है?

    उत्तर. अश्वशक्ति या इंजन अश्वशक्ति एक ट्रैक्टर के विभिन्न कार्यों को संचालित करने के लिए एक इंजन का उत्पादन करने वाली शक्ति की ओर जाता है।

    Q.6 ट्रैक्टर में टॉर्क क्या होता है?

    उत्तर. ट्रैक्टर टॉर्क उस भार को परिभाषित करता है जिसका प्रतिरोध एक ट्रैक्टर अपने अधिकतम इंजन RPM पर काम करते समय कर सकता है, जो एक ट्रैक्टर की प्रमुख क्षमताओं को दर्शाता है।

    Q.7 ट्रैक्टर का RPM क्या होता है?

    उत्तर. आरपीएम प्रति मिनट ट्रैक्टर इंजन के क्रांतियों के लिए खड़ा है। 1300-1500 के बीच RPM ट्रैक्टरों के लिए आदर्श है जो उन्हें स्थिर गति से चलने और खेत में ईंधन दक्षता बनाए रखने में मदद करता है।

    Q.8 भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाला ट्रैक्टर कौन सा है?

    उत्तर. 2wd में, Mahindra 275 DI TU सबसे अधिक बिकने वाला ट्रैक्टर है। 4डब्ल्यूडी में, महिंद्रा अर्जुन नोवो 605 सबसे लोकप्रिय ट्रैक्टर है।

    Q.9 कृषि में कितने प्रकार के ट्रैक्टर का उपयोग किया जाता है?

    उत्तर. कृषि में उपयोग किए जाने वाले सबसे आम ट्रैक्टर हैं मिनी ट्रैक्टर, यूटिलिटी ट्रैक्टर, एसी केबिन ट्रैक्टर, पंक्ति फसल ट्रैक्टर, बाग ट्रैक्टर, वाहक ट्रैक्टर, 2 डब्ल्यूडी ट्रैक्टर, 4 डब्ल्यूडी ट्रैक्टर आदि।

    Q.10 एक मिनी ट्रैक्टर में HP रेंज क्या है?

    उत्तर. मिनी ट्रैक्टर एचपी की रेंज 20 एचपी से कम से शुरू होती है और अधिकतम 30 एचपी तक जाती है।

    Q.11 ट्रैक्टर इंजन में सीसी क्या होता है?

    उत्तर. CC का मतलब घन सेंटीमीटर है जो इंजन के विस्थापन या इंजन के आयतन को मापता है यानी सभी सिलेंडरों के आयतन का योग।

    Q.12  ट्रैक्टर का रखरखाव कैसे करते हैं?

    उत्तर. नियमित रूप से रेडिएटर-फ्लूड लेवल, ट्रैक्टर का तेल, टायर प्रेशर, एयर फिल्टर की जांच करने से खेत ट्रैक्टर को बनाए रखने में मदद मिलती है।

    Q.13  ट्रैक्टरों में 4 व्हील ड्राइव कितना महत्वपूर्ण है?

    उत्तर. 4 व्हील ड्राइव ट्रैक्टर व्यापक हैं, कम मोड़ प्रतिरोध है, पावर स्टीयरिंग सिस्टम के लिए आदर्श हैं, ट्रैक्टर के शुरुआती टूट-फूट को रोकता है।

    Q.14  2 एकड़ जमीन के लिए कौन सा ट्रैक्टर सबसे अच्छा है?

    उत्तर. 15-25 एचपी का ट्रैक्टर 2 एकड़ जमीन के लिए पर्याप्त होगा।

    Q.15 खेत ट्रैक्टर की विस्थापन क्षमता और CC में क्या अंतर है?

    उत्तर. दोनों में कोई अंतर नहीं है, क्योंकि CC ट्रैक्टरों के इंजन विस्थापन की इकाई है।

    Q.16 भारत में पुराना ट्रैक्टर कैसे प्राप्त कर सकता हूं?

    उत्तर.  ट्रैक्टर जंक्शन पर पूरी जानकारी के साथ भारत में सबसे अच्छा इस्तेमाल किया जाने वाला ट्रैक्टर खरीद सकते हैं।

    Q.17  पुराना ट्रैक्टर खरीदने से पहले क्या जांच करनी चाहिए?

    उत्तर. उपयोग किए गए ट्रैक्टर को खरीदने से पहले उचित ग्रीसिंग, क्लच कार्यप्रणाली, इंजन ऑयल लीकेज और स्टीयरिंग लॉक सुनिश्चित करें।

    Q.18 एक फार्म ट्रैक्टर में तीन-बिंदु अड़चन क्यों महत्वपूर्ण है?

    उत्तर. एक ट्रैक्टर की तीन-बिंदु अड़चन कृषि उपकरणों को संभालती है, जो खेती के कार्यों के लिए महत्वपूर्ण है।

    Q.19 भारत में कितने विभिन्न प्रकार की खेती के तरीके हैं?

    उत्तर. जैविक खेती, निर्वाह खेती, वाणिज्यिक खेती भारत में लोकप्रिय खेती के तरीके हैं। हालाँकि, भौगोलिक परिस्थितियों, उत्पादन की माँग, प्रौद्योगिकी के स्तर और श्रम के आधार पर खेती, लेई फार्मिंग, बागवानी, कृषि वानिकी आदि पर आधारित हो सकती है।

    Q.20 कृषि पद्धतियां कितने प्रकार की होती हैं?

    उत्तर. मिश्रित खेती, स्थानांतरण कृषि, सघन खेती, फसल रोटेशन, वृक्षारोपण कृषि, कृषि योग्य खेती कुछ लोकप्रिय प्रकार की कृषि प्रथाएं हैं।

    Q.21 भारत में कितने फसल मौसम हैं?

    उत्तर. भारत में जायद, रबी और खरीफ जैसी तीन मौसम की फसलें होती हैं।

    Q.22 जायद फसल क्या है उदाहरण सहित ?

    उत्तर. ये ग्रीष्म ऋतु की फसलें हैं, जो मार्च से जून के बीच छोटी अवधि के लिए उगाई जाती हैं।

    Q.23 खरीफ मौसम क्या है?

    उत्तर. भारत में खरीफ का मौसम जून में शुरू होता है और अक्टूबर में समाप्त होता है।

    Q.24 रबी की फसलें कौन-कौन सी हैं, उदाहरण सहित ?

    उत्तर. रबी की फसल सर्दियों में अक्टूबर से नवंबर के बीच उगाई जाती है। जौ, जई, गेहूं, दालें रबी फसलों के कुछ उदाहरण हैं।

    Q.25 आधुनिक कृषि क्या है ?

    उत्तर. आधुनिक कृषि में उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी और खेती की तकनीकों का उपयोग शामिल है जो लागत कम करती है, दक्षता और फसल की उपज में वृद्धि करती है।

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    Q.26 कृषि और खेती में क्या अंतर है?

    उत्तर. कृषि एक विशाल शब्द है जिसमें फसलों को उगाना और पशुओं को पालना शामिल है जो भोजन और उपयोगिता संसाधन प्रदान करते हैं। इसमें R&D, उत्पादन, वितरण, उन्नत तकनीक और बहुत कुछ शामिल है। जबकि खेती कृषि का हिस्सा है जो पौधे या आधुनिक विज्ञान पर आधारित है, जिसमें फसलों को उगाने के लिए मिट्टी की खेती करना और उनके उप-उत्पादों के लिए जानवरों को पालना शामिल है।

    Q.27 भारत का सबसे अमीर किसान कौन है?

    उत्तर. प्रमोद गौतम, सचिन काले, हरीश धनदेव भारत के कुछ सबसे अमीर किसान हैं।

    Q.28 भारत में आधुनिक कृषि के जनक कौन हैं?

    उत्तर. डॉ एम एस स्वामीनाथन “भारत में आधुनिक कृषि के जनक” हैं।

    Q.29 स्वस्थ मिट्टी को बनाए रखना क्यों महत्वपूर्ण है?

    उत्तर. एक स्वस्थ मिट्टी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह फसल उत्पादक पौधों को आवश्यक पोषक तत्व, ऑक्सीजन, पानी और जड़ समर्थन प्रदान करती है।

    Q.30 जैविक कीटनाशक क्या होते हैं?

    उत्तर. जैविक कीटनाशक वनस्पति और खनिज स्रोतों से प्राप्त होते हैं। इनमें कम रसायन होते हैं और रासायनिक आधारित कीटनाशकों की तुलना में कम खतरनाक होते हैं।

    Q.31 मिट्टी के बारे में क्या तथ्य हैं?

    उत्तर. मिट्टी एक गैर-नवीकरणीय संसाधन है जो वातावरण से टन CO2 (कार्बन) निकाल सकती है।

    Q.32 जैविक खेती के क्या लाभ हैं?

    उत्तर. जैविक खेती कीटनाशकों, शाकनाशियों और अन्य हानिकारक रसायनों के उपयोग को रोकती है। जैविक खेती से पौधे और कीट जीवित रहेंगे।

    Q.33 भारत में जैविक खेती के जनक कौन हैं?

    उत्तर. सुभाष पालेकर भारत में जैविक खेती के जनक हैं।

    Q.34 भारतीय कृषि जीडीपी इतनी कम क्यों है?

    उत्तर. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी, ऊर्जा सुविधाओं और सिंचाई की कमी भारतीय कृषि जीडीपी के कम होने का कारण है।

    Q.35 खेती के 2 मुख्य प्रकार कौन से हैं?

    उत्तर. निर्वाह खेती और वाणिज्यिक खेती खेती के दो मुख्य प्रकार हैं।

    Q.36 ग्रीनहाउस के विभिन्न प्रकार क्या हैं?

    उत्तर. ग्रीनहाउस को आकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है जैसे कि उठा हुआ गुंबद, गैबल, स्किलियन, फ्लैट आर्क, टनल, सॉटूथ।

    Q.37 भारत में कौन सा राज्य बागों के लिए प्रसिद्ध है?

    उत्तर. महाराष्ट्र भारत में बागों के लिए प्रसिद्ध है।

    Q.38 भारत में किस फल की खेती सबसे अधिक लाभदायक है?

    उत्तर. भारत में अंबरेला, करौंदा, तरगोला, फालसा और कई अन्य फलों के खेत सबसे अधिक लाभदायक हैं।

    Q.39 कृषि क्षेत्र में सरकार की पहल क्या हैं?

    उत्तर. भारत सरकार ने किसानों के लिए प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) और कई अन्य योजनाएं शुरू कीं।

    Q.40 किसानों के सामने आने वाली 5 प्रमुख समस्याएं क्या हैं?

    उत्तर. किसानों के सामने आने वाली 5 प्रमुख समस्याएं जलवायु परिवर्तन, मिट्टी का क्षरण, जैव विविधता का नुकसान, नई तकनीकों को अपनाना और बढ़ती खाद्य मांग हैं।

    Q.41 कृषि द्वारा सकल घरेलू उत्पाद का कितना प्रतिशत लिया जाता है?

    उत्तर. भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 18 प्रतिशत कृषि द्वारा लिया जाता है।

    Q.42 वर्षा ऋतु में कौन सी फसलें उगाई जाती हैं?

    उत्तर. खरीफ की फसलें, जिन्हें मानसून की फसलें भी कहा जाता है, बरसात के मौसम में उगाई जाती हैं जैसे चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, कपास और अन्य।

    Q.43 ड्रिप सिंचाई क्या है?

    उत्तर. ड्रिप सिंचाई जड़ों को पानी की कुशल आपूर्ति के लिए लगभग 2-20 लीटर/घंटे की धीमी गति से मिट्टी में पानी टपकाने की विधि है।

    Q.44 खेती का भविष्य क्या है?

    उत्तर. रोबोट, हवाई चित्र, तापमान और नमी सेंसर और जीपीएस तकनीक का उपयोग खेती का भविष्य है।

    Q.45 भारत में सबसे अधिक लाभदायक खेती कौन सी है?

    उत्तर. पोल्ट्री फार्मिंग, जैविक खेती, डेयरी फार्मिंग और अन्य भारत में सबसे अधिक लाभदायक खेती हैं।

    Q.46 नारियल के पेड़ की उम्र कितनी होती है?

    उत्तर. नारियल के पेड़ 60-80 साल तक जीवित रह सकते हैं, जिससे किसानों की लगभग तीन पीढ़ियों को उपज मिलती है।

    Q.47 रेशम उत्पादन क्या है?

    उत्तर. सेरीकल्चर कैटरपिलर (लार्वा) के प्रजनन, पालन और घरेलूकरण द्वारा कच्चे रेशम के उत्पादन की एक प्रक्रिया है।

    Q.48 खेती के लिए मूलभूत आवश्यकताएँ क्या हैं?

    उत्तर. खेती के लिए हवा, पोषक तत्व, भूमि, पानी और धूप जैसे प्राकृतिक संसाधन आवश्यक हैं।

    Q.49 GMO (आनुवंशिक रूप से संशोधित जीव) बीज क्या हैं?

    उत्तर. जीएमओ आनुवंशिक रूप से संशोधित बीज हैं जिन्हें शाकनाशियों या कीटों का प्रतिरोध करने के लिए संशोधित किया गया है।

    Q.50 भारतीय कृषि क्षेत्र में सरकारी सब्सिडी की क्या आवश्यकता है?

    उत्तर. सब्सिडी भारत के छोटे किसानों की आजीविका को बढ़ावा देने में मदद करती है क्योंकि वे आर्थिक रूप से स्थिर नहीं होते हैं।

    Q.51 भारत में सबसे अधिक उपभोग होने वाली फसल कोन-सी है?

    उत्तर:  भारत में सबसे अधिक उपभोग होने वाली  फसल दाल और आटे की है ।

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  • कपास क्या है, कपास की खेती का सही समय क्या है और कपास से जुडी कुछ जानकारी | Kapas Ki Kheti Kaise Kare

    कपास क्या है, कपास की खेती का सही समय क्या है और कपास से जुडी कुछ जानकारी | Kapas Ki Kheti Kaise Kare

    कपास क्या है | Kapas Kya Hai

    Kapas Ki Kheti Kaise Kare:- भारत की सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसलों और फाइबर में से एक, कपास देश की औद्योगिक और कृषि अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण है। यह सूती वस्त्र उद्योग को इसका मुख्य कच्चा माल (सूती रेशा) देता है। भारत में कपास तत्काल प्रदान करता है

    कपास के व्यापार और उसके प्रसंस्करण में 40-50 मिलियन से अधिक लोग काम कर रहे हैं, जो 6 मिलियन किसानों के लिए जीवनयापन प्रदान करते हैं।

    भारत में दस महत्वपूर्ण कपास उगाने वाले राज्य हैं, और इन राज्यों को आगे तीन क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है: उत्तर क्षेत्र, मध्य क्षेत्र और दक्षिण क्षेत्र। राजस्थान, हरियाणा और पंजाब उत्तरी क्षेत्र बनाते हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सभी केंद्रीय क्षेत्र का हिस्सा हैं।
    दक्षिण क्षेत्र में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु शामिल हैं। इन ग्यारह राज्यों के अलावा, पूर्व में उड़ीसा में कपास की खेती में वृद्धि देखी गई है।
    इसके अलावा, उत्तर प्रदेश जैसे गैर-पारंपरिक राज्यों में छोटे-छोटे टुकड़ों में कपास उगाई जाती है।

    कपास की खेती को अथक खेती(tireless farming) के रूप में जाना जाता है, कपास को विकसित करने के लिए अधिक मेहनत की आवश्यकता होती है। इसका उपयोग कपड़े बनाने, बीजों को रुई से साफ करने, रुई का उपयोग कपड़े के तंतु बनाने में तथा बीजों से तेल अलग करने के लिए किया जाता है। बीजों का वह भाग जो तेल निकालने के बाद बचा रहता है, पशु आहार के रूप में उपयोग किया जाता है।

    कपास क्या है, कपास की खेती का सही समय क्या है और कपास से जुडी कुछ जानकारी | Kapas Ki Kheti Kaise Kare
    Kapas Ki Kheti Kaise Kare

    इसके विकास के लिए किसी विशेष वातावरण की आवश्यकता नहीं होती है, कई स्थानों पर कपास की उपज होने के कारण इसकी कई किस्में देखने को मिलती हैं, इसे सफेद सोना भी कहा जाता है। कपास के विकास में जल प्रणाली की अधिक आवश्यकता न होने के कारण इसे कभी भी विकसित किया जा सकता है।

    कपास सिंचाई तकनीक | Kapas Ki Sichayi Kaise Kare

    Kapas Ki Kheti Kaise Kare:- कपास की खेती बहुत कम मात्रा में पानी का उपयोग करती है; यदि फसल बरसात के मौसम में उगाई जाती है तो उसे प्रारम्भिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है और यदि नहीं होती है तो 45 दिनों के बाद सिंचाई पूरी कर ली जाती है। आपूर्ति की जानी चाहिए

    कपास के पौधों को अधिक धूप से लाभ होता है इसलिए शुरूआती सिंचाई के बाद आवश्यकतानुसार ही पानी देना चाहिए। हालांकि, पौधे की फूल अवधि के दौरान, फूलों को गिरने से रोकने के लिए नमी का उचित स्तर मिट्टी में रहना चाहिए, लेकिन अतिरिक्त पानी देने से भी बचना चाहिए क्योंकि इससे फूलों को नुकसान पहुंचने की संभावना रहती है।

    कपास विकसित करने के निर्देश | Kapas Ko Jaldi Ugane Ke Tarike

    Kapas Ki Kheti Kaise Kare:- कपास की खेती को कठिन खेती के रूप में जाना जाता है, इसमें कपास के विकास के लिए अधिक मेहनत की आवश्यकता होती है। इसका उपयोग कपड़ा बनाने में, बीजों को रुई से साफ करने में, रुई का उपयोग कपड़े के तंतु बनाने में तथा बीजों से तेल निकालने के लिए किया जाता है। बीजों का जो भाग तेल निकलने के बाद बच जाता है उसका उपयोग पशु चारे के रूप में किया जाता है।

    कपास क्या है, कपास की खेती का सही समय क्या है और कपास से जुडी कुछ जानकारी | Kapas Ki Kheti Kaise Kare
    Kapas Ki Kheti Kaise Kare

    इसके विकास के लिए किसी विशेष वातावरण की आवश्यकता नहीं होती है, कई स्थानों पर कपास का विकास होने के कारण इसकी कई किस्में देखने को मिलती हैं, इसे सफेद सोना भी कहा जाता है। कपास के विकास में जल प्रणाली की अधिक आवश्यकता न होने के कारण यह कभी भी विकसित हो जाती है।

    कपास के विकास के लिए किस प्रकार की मिटी की आवश्यकता होती है ?

    बुली, दोमट मिट्टी और काली मिट्टी कपास के विकास के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है, ऐसी मिट्टी में कपास की उपज सामान्यत: अच्छी होती है। वैसे तो अभी तक कई प्रकार की किस्में देखने को मिल गई हैं, जिससे अब ढालू और रेतीली जगहों पर भी कपास को प्रभावी ढंग से विकसित किया जा सकता है, कपास के विकास में कम पानी की उम्मीद की जाती है। इसलिए इसे बड़ी बर्बादी वाली मिट्टी में उगाना चाहिए। इसके लिए पी.एच. ज़मीन का। मूल्य 5.5 से 6 के बीच होना चाहिए।

    कपास के विकास के लिए आवश्यक पर्यावरण और तापमान ?

    वैसे तो कपास की खेती के लिए किसी विशेष प्रकार के वातावरण की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन जब पौधे फल देने लगते हैं, तो सर्दियों में बर्फ गिरने से नुकसान होता है। जब उसमें कलियाँ निकलने लगती हैं, तब उसे तेज धूप की आवश्यकता होती है।

    कपास की खेती में किसी विशेष तापमान की आवश्यकता नहीं होती है, जब कपास के बीज खेत में उगने लगते हैं तो उसे 20 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है। इसके बाद इसके पौधे 25 से 30 डिग्री तापमान विकसित होने की उम्मीद करते हैं। यह उच्च तापमान पर भी अच्छी तरह से विकसित हो सकता है।

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    कपास के विभिन्न प्रकार | Kapas Kitne Tarah Ke Hote Hai

    Kapas Ki Kheti Kaise Kare:- अभी तक कपास की कई निर्मित किस्में देखने को मिलती हैं, इस किस्म की किस्मों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है। कपास के रेशों के आधार पर इनके वर्गीकरण को विभिन्न वर्गों में रखा गया है। अनुपात के आधार पर इन्हें तीन भागों में बांटा गया है। जिनका डाटा इस प्रकार दिया गया है:-

    लघु फाइबर कपास
    इस तरह के कपास के तंतु 3.5 सेंटीमीटर से कम लंबे होते हैं। यह उत्तर भारत में सबसे विकसित किस्म है। यह असम, हरियाणा, राजस्थान, त्रिपुरा, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मेघालय में अधिक भरा हुआ है। उत्पादन की बात करें तो कुल उत्पादन का 15 फीसदी कपास इन्हीं राज्यों से होता है।

    मध्यम फाइबर कपास
    इस वर्ग में आने वाले कपास के रेशों की लंबाई 3.5 से 5 सेमी के बीच होती है। यह कपास की मिश्रित श्रेणी के अंतर्गत आता है, इस प्रकार का वर्गीकरण भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में किया जाता है। इस प्रकार का कपास सृष्टि का लगभग 45% प्रतिनिधित्व करता है।

    विशाल रेशमी कपास
    इस कपास को कपास की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, इस कपास के रेशों की लंबाई 5 सेंटीमीटर से अधिक होती है। इस रेशे का उपयोग उत्तम वस्त्रों की योजना बनाने में किया जाता है। यह किस्म भारत में दूसरे नम्बर पर उगाई जाती है, इसका विकास मुख्य रूप से समुद्रतटीय प्रदेशों में होता है, इसलिए इसे समुद्री द्वीपीय कपास भी कहा जाता है। कपास के पूर्ण निर्माण में इसका हिस्सा अंततः 40% पर निर्भर करता है।

    कपास क्या है, कपास की खेती का सही समय क्या है और कपास से जुडी कुछ जानकारी | Kapas Ki Kheti Kaise Kare
    Kapas Ki Kheti Kaise Kare

    कपास के विकास की सही तकनीक क्या है 

    इसके लिए पहले खेत में अच्छी तरह से जोताई करा लें, उसके बाद जो लायक हो उसे छोड़ दें, फिर उसमें गाय की खाद की खाद डालें और फिर से कुछ बार जोताई कराएं, जिससे गाय का मल-मूत्र निकल जाए। गंदगी में अच्छी तरह मिल जाएगा।

    इसके बाद खेत में पानी लगा देना चाहिए, पानी सूख जाने पर खेत में फिर से हल चला दें। एक बार फिर ऐसा करने से खेत में स्थापित सभी खरपतवार समाप्त हो जायेंगे तथा कूड़ लगाने के बाद खेत में पानी लगा दें।

    इसके बाद खेत को पाटकर समतल कर लें। वर्तमान में भूमि समतल होने के बाद खेत में खाद डालकर खेत की जुताई करें। तत्पश्चात दूसरे दिन बीजों को खेत में बो दें, रात के समय कपास के बीजों को खेत में स्थापित करना श्रेष्ठ माना जाता है।

    कपास बीज रोपण का सही तरीका क्या है

    Kapas Ki Kheti Kaise Kare:- कपास के बीजों को खेत में लगाने से पहले उपचारित कर लेना चाहिए। जिससे बीजों में कीट रोग का जुआ कम हो जाता है। बीजों को कार्बोसल्फान या इमिडाक्लोप्रिड से उपचारित कर खेत में स्थापित करना चाहिए। खेत में स्थानीय किस्म के बीजों की स्थापना करते समय दो कतारों के बीच 40 सेंटीमीटर और दो पौधों के बीच 30 से 35 सेंटीमीटर की दूरी होना जरूरी है।

    अमेरिकी किस्म के बीजों की बात करें तो दो कतारों के बीच 50 से 60 सेंटीमीटर और दो पौधों के बीच 40 सेंटीमीटर की दूरी होनी चाहिए। इन बीजों को ऊपर की किसी चीज के अंदर नहीं लगाना चाहिए, जिससे इन्हें निकलने में दिक्कत हो सकती है और एक हिस्से की जमीन में 4 किलो तक बीज लगाए जा सकते हैं।

    आधी नस्ल के बीटी पौधों के बीज खेत में बोते समय दो खंभों के बीच 100 सेंटीमीटर और दो पौधों के बीच 60 से 80 सेंटीमीटर की दूरी होनी चाहिए। ये काफी दूर तक फैले पौधे हैं, इसलिए एक बीघा खेत में 450 ग्राम बीज ही लगाना चाहिए।

    Kapas Ki Kheti Kaise Kare

     

    कपास की खेती का सही समय क्या है

    कपास की खेती ज्यादातर मई माह में की जाती है क्यकि उस  समय  सिचाई की सुविधा उपलभ्द होती है, यदि सिचाई सुविधा उपलभ्ध है तो कपास की खेती खेती को मई माह में लगवाए, और यदि कपास की खेती के लिए सिचाई की सुविधा उपलभ्द नहीं है तो मानसून( वर्षा जलवायु ) का  इंतज़ार करे ।

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  • Krishi Budget Highlights 2023-2024

    Krishi Budget Highlights 2023-2024

    कृषि बजट हाइलाइट्स 2023-2024(Krishi Budget Highlights 2023-2024)

    एसोसिएशन की वित्तीय योजना 2023-24 में ग्रामीण शिक्षा और अन्वेषण सहित एग्रीबिजनेस और रैंचर्स सरकारी सहायता की सेवा के लिए मौद्रिक हिस्सा लगभग 1.25 लाख करोड़ रुपये होगा। इसमें रुपये की व्यवस्था शामिल है। मोदी सरकार के आक्रामक पीएम-किसान के लिए 60,000 करोड़ का प्रावधान किया जाएगा। पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए कृषि अग्रिम उद्देश्य को बढ़ाकर 20 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है और इस व्यय योजना में काफी अधिक घोषित किया जाएगा।

    2023-24 की व्यय योजना में लोक प्राधिकरण ने बागवानी में किन महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया है। एमआर सुब्रमणि, हेड, प्रोडक्ट्स और एग्रीबिजनेस, बिजनेसलाइन अधिक बताते हैं।

    किसान बजट में निम्नलिखित पांच प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की उम्मीद है:

    1. कृषि उत्पादकता में वृद्धि: सरकार किसानों को उन्नत कृषि प्रौद्योगिकियों और बेहतर सिंचाई सुविधाओं तक पहुंच प्रदान करके कृषि उत्पादकता और दक्षता में सुधार पर ध्यान केंद्रित कर सकती है।

    2. क्रेडिट तक पहुंच बढ़ाना: सरकार संस्थागत क्रेडिट तक आसान पहुंच प्रदान करके किसानों, विशेष रूप से समाज के कमजोर वर्गों के लिए क्रेडिट तक पहुंच बढ़ाने की संभावना है।

    3. कृषि आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना: सरकार किसानों को बेहतर बाजार पहुंच प्रदान करके कृषि आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर भी ध्यान केंद्रित कर सकती है।

    4. भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं तक पहुंच में सुधार: सरकार द्वारा किसानों को भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ाने की संभावना है, ताकि वे बेहतर लाभ के लिए अपनी उपज का भंडारण और प्रसंस्करण कर सकें।

    5. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार: सरकार से किसानों को सब्सिडी और अन्य प्रोत्साहन प्रदान करने के साथ-साथ स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और स्वच्छता जैसी आवश्यक सेवाओं तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करके समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार करने पर भी ध्यान देने की उम्मीद है।

    किसान बजट भारत में कृषि उत्पादकता और आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होने की उम्मीद है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और असमानता को कम करने में भी मदद करेगा। सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य लेकर चल रही है और किसान बजट इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

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    2023 का बजट की डिटेल्स 

    एसोसिएशन मनी पादरी निर्मला सीतारमण ने सामान्य वित्तीय योजना 2023 की शुरुआत की। धन पादरी ने वर्ष 2023 की वित्तीय योजना में किसानों का विशेष ध्यान रखा है और किसानों के वेतन को बढ़ाने के कई तरीके खोजे हैं। किसान समृद्धि योजना के बाद इस साल सरकार ने कई अन्य योजनाओं को शुरू करने की घोषणा की है। सार्वजनिक प्राधिकरण ने पशु चरवाहों और मत्स्य पालन करने वालों के लिए भी कुछ कदम उठाए हैं।

    सामान्य व्यय योजना के प्रवचन के दौरान मनी प्रीस्ट ने घोषणा की है कि किसानों के सहयोग से सफलता कार्यक्रम चलाया जाएगा। इसके जरिए 63000 एग्री सोशल ऑर्डर्स को ऑटोमेटेड किया जाएगा। इससे किसानों को समृद्ध बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही पशुपालन के क्षेत्र में ऋण देने की गति का विस्तार करने, मछली पालन एवं बहुउद्देश्यीय कॉर्पोरेट सामाजिक व्यवस्थाओं को उन्नत करने की घोषणा की है। साथ ही साहूकार ने प्रधानमंत्री मत्स्य पालन योजना शुरू करने का भी निर्णय लिया है। इसके साथ ही, सार्वजनिक प्राधिकरण ने कम्प्यूटरीकृत नवाचार के माध्यम से कृषि व्यवसाय को आगे बढ़ाने का विकल्प चुना है।

    पशुपालकों को उन्नत तरीके से मदद की जाएगी

    खर्च योजना का परिचय देते हुए मनी पुजारी निर्मला सीतारमण ने बताया कि किसानों की मदद के लिए कंप्यूटराइज्ड पब्लिक फ्रेमवर्क बनाया जाएगा. यहां से किसानों को बागवानी से संबंधित व्यवस्था, अग्रिम, संरक्षण और फसल उत्पादन को कैसे बढ़ाया जाए, इसकी जानकारी दी जाएगी। साथ ही इस कंप्यूटराइज्ड पब्लिक फाउंडेशन की मदद से किसानों को यह भी मदद मिलेगी कि कैसे अपनी उपज को बाजार में अच्छी कीमत पर बेचा जा सकता है।

    खेती से जुड़ी नई कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा

    वित्तीय योजना 2023 का परिचय देते हुए, मनी प्रीस्ट ने कहा कि भारत का सार्वजनिक प्राधिकरण बागवानी क्षेत्र में नई कंपनियों को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर संपत्ति देगा। ग्रामीण अंचलों के युवा व्यवसायियों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार हर संभव सहयोग देगी। संपत्ति की सहायता से जो सार्वजनिक प्राधिकरण कृषि व्यवसाय क्षेत्र को समायोजित करेगा, किसानों के नियमित मुद्दों का निपटारा किया जाएगा। इस संपत्ति की मदद से कृषि तकनीक उद्योग को भी आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

    सरकार कपास की फसल पर अधिक ध्यान देगी

    वित्तीय योजना 2023 में कपास की फसल पर अधिक ध्यान दिया गया है। लोक प्राधिकरण ने कहा है कि वह एक सार्वजनिक-निजी संगठन को आकार देगा, जिसकी मदद से पशुपालक इसके निर्माण और आदान-प्रदान में मदद करेंगे। सार्वजनिक गोपनीय संगठन का तात्पर्य है कि यह एक प्रकार का संबंध होगा जो किसान, राज्य सरकार और व्यवसाय के बीच स्थापित होगा।

    स्वच्छ पौधा कार्यक्रम के लिए 2200 करोड़

    वित्तीय योजना का परिचय देते हुए, मनी प्रीस्ट निर्मला सीतारमण ने स्वतंत्र स्वच्छ संयंत्र कार्यक्रम का संदर्भ दिया और उन्होंने इसके लिए 2,200 करोड़ रुपये की घोषणा की। स्वच्छ पौधा कार्यक्रम का अर्थ है ऐसे खेतों में फसल उगाना जो बिना बीमारी के हों और जिनके पौधों से उच्च गुणवत्ता वाले अनाज का उत्पादन होता हो।

    भारत बाजरा के लिए विश्वव्यापी केंद्र बन जाएगा

    वित्तीय योजना का परिचय देते हुए, मनी प्रीस्ट ने कहा कि भारत ग्रह पर बाजरा का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। हम विभिन्न प्रकार के ‘श्री अन्ना’ का उत्पादन करते हैं। इनमें ज्वार, रागी, बाजरा, कुट्टू, रामदाना, कंगनी, कुटकी, कोदो, छिना और समा शामिल हैं। मोटे अनाज की यह बड़ी संख्या हमारे स्वास्थ्य के लिए असाधारण रूप से सहायक है। पशुपालक श्री अन्ना की डिलीवरी कर लोगों की सेहत पर काम कर रहे हैं। मिलेट एक्सप्लोरेशन, हैदराबाद की भारतीय स्थापना श्री अन्ना के मुद्दे में भारत को विश्वव्यापी केंद्र बिंदु बनाने में असाधारण सहायता करेगी। यह संस्था बाजरा से जुड़े परीक्षण नवाचार को वैश्विक स्तर पर और उसकी उन्नत निर्माण रणनीतियों को बताती रही है।

    मत्स्य पालन के लिए 6000 करोड़

    वित्तीय योजना 2023 का परिचय देते हुए, मनी पास्टर निर्मला सीतारमण ने मछली की खेती में भाग लेने वाले किसानों को ‘पीएम मत्स्य संपदा योजना’ के तहत लाभ की घोषणा की। इसके तहत, 6000 करोड़ रुपये की राशि का वितरण किया गया है, जिसका उपयोग मछली की खेती और बिक्री में भाग लेने वाले छोटे डीलरों की मदद के लिए किया जाएगा। भारत के सार्वजनिक प्राधिकरण को विश्व स्तर पर मछली की खेती के क्षेत्र को विकसित करने की आवश्यकता है।

    सहकारी समितियों के माध्यम से पशुपालकों की मदद करना

    सार्वजनिक प्राधिकरण को छोटे किसानों के लिए सहायक आधारित मौद्रिक ढांचे को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इन किसानों की मदद के लिए सरकार स्वेच्छा से ‘सहरकार से समृद्धि’ योजना चला रही है। इसके लिए लोक प्राधिकरण ने 2516 करोड़ रुपये खर्च कर 63000 कृषि सामाजिक व्यवस्थाओं का आधुनिकीकरण किया है।

    नियमित खेती की उन्नति

    सामान्य खेती को आगे बढ़ाने के लिए भारत सरकार एक करोड़ किसानों को नियमित खेती के लिए समर्थन देगी। यह काम आने वाले 3 साल में पूरा हो जाएगा। साथ ही 10000 बायो इन्फॉर्मेशन एक्सप्लोरेशन सेंटर भी रखे जाएंगे।

    पि. एम्. किसान सम्मान निधि योजना

    भारत सरकार का प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि केंद्रीय क्षेत्र कार्यक्रम किसानों और उनके परिवारों को आय सहायता प्रदान करता है। तेलंगाना सरकार ने सबसे पहले पीएम-किसान कार्यक्रम को रायथु बंधु कार्यक्रम के रूप में संचालित किया, जिसने पात्र किसानों को सीधे एक विशिष्ट राशि दी। आखिरकार, 1 फरवरी, 2019 को, पीयूष गोयल ने भारत के 2019 के अंतरिम केंद्रीय बजट के दौरान इस कार्यक्रम के रोलआउट को एक राष्ट्रीय परियोजना के रूप में घोषित किया। 24 फरवरी, 2019 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में पीएम-किसान कार्यक्रम की शुरुआत की। सभी छोटे और सीमांत किसानों को इस कार्यक्रम के तहत रुपये की राशि में आय सहायता प्राप्त होगी। तीन किस्तों में 6,000 सालाना, जो उनके बैंक खातों में डाले जाएंगे। इस योजना के लिए कुल वार्षिक व्यय 75,000 करोड़ रुपये होने की उम्मीद है जिसे केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित किया जाएगा।

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